Patra-lekhan(Letter-writing)-(पत्र-लेखन)


अपने छोटे भाई को एक पत्र लिखिए जिसमें अध्ययन की उपेक्षा करने के लिए उसे डाँटिए।

जिला स्कूल छात्रावास,
राँची
7 जनवरी, 1988

प्रिय अजय,

मुझे अभी पिताजी का एक पत्र मिला है। उनके पत्र से यह जानकर कि तुम गत वार्षिक परीक्षा में असफल हो गए हो मुझे बहुत दुःख है। मैंने तुम्हें दुर्गापूजा की छुट्टी में कहा था कि तुम्हें कठिन परिश्रम करना चाहिए। तुमने मेरी राय पर ध्यान नहीं दिया। तुमने अध्ययन की उपेक्षा की है। इसलिए तुम परीक्षा में असफल हो गए हो।

तुम्हें स्कूल में पढ़ने के लिए भेजा गया है। अब तुम बच्चे नहीं हो। तुम्हें यह जानना चाहिए कि तुम्हें क्या करना है। यदि तुम इस प्रकार अध्ययन की उपेक्षा करोगे तो बाद में तुम्हें दुखी होना पड़ेगा, जब तुम कुछ नहीं कर सकोगे। अपना समय बरबाद नहीं करो। तुम एक वर्ष खो चुके हो, क्योंकि तुमने अध्ययन की उपेक्षा की है। परीक्षा में असफल होना तुम्हारे लिए लज्जाजनक हैं। यदि तुम पढ़ाई पर ध्यान नहीं दोगे तो तुम्हें भविष्य में पछताना पड़ेगा।

तुम्हारी असफलता से पिताजी और माताजी दोनों को अत्यंत दुःख है। तुम्हें अपना सुधार अवश्य करना चाहिए। अच्छा लड़का बनो और पढ़ने में लग जाओ। आशा है, तुम अपनी गलती महसूस करोगे।

शुभकामनाओं के साथ-
तुम्हारा प्रिय भाई,
उमेश
पता- श्री अजय कुमार,
नवम वर्ग,
एस० एच० ई० स्कूल, सुरसंड,
पो० ऑ०- सुरसंड,
जिला- सीतामढ़ी

एक पत्र में अपने चचेरे भाई से अनुरोध कीजिए कि वे छुट्टी में आपको अपना कैमरा दें।

कदमकुआँ,
पटना -3
15 दिसंबर, 1988

पूज्यवर भ्राताजी,

बहुत दिनों से आपका कोई पत्र मुझे नहीं मिला है। मेरी वार्षिक परीक्षा खत्म हो गई है और मैं बड़े दिन की छुट्टी का इंतजार कर रहा हूँ। मैंने छुट्टी में दिल्ली और आगरा जाने का निश्र्चय किया है।

मैं आपको कुछ कष्ट देना चाहता हूँ। मैं छुट्टी में आपका कैमरा लेना चाहूँगा। यदि मुझे आपका कैमरा मिल जाए तो मैं दिल्ली और आगरे की अपनी यात्रा में कुछ मनोरंजक फोटो खीचूँगा। आप जानते है कि मैं आपके कैमरे का प्रयोग अच्छी तरह कर सकता हूँ।

कृपया अपना कैमरा मुझे एक सप्ताह के लिए दें। मुझे उम्मीद है कि आप मुझे निराश नहीं करेंगे। मैं आपको विश्र्वास दिला सकता हूँ कि आपके कैमरे को अच्छी तरह रखूँगा। ज्योंही मैं यहाँ लौटकर आऊँगा, त्योंही मैं आपको यह लौटा दूँगा।
कृपया मेरा प्रणाम चाचाजी और चाचाजी को कह देंगे।

आपका स्त्रेह भाजन
उदय
पता- श्री श्याम कुमार,
कोर्ट रोड, बाढ़
जिला-पटना

अपने छोटे भाई को एक पत्र लिखिए जिसमें उसे स्कूल में अच्छा व्यवहार करने की राय दीजिए।

स्टेशन रोड,
सीतामढ़ी
10 जनवरी, 1988

प्रिय नरेंद्र,

आज तुम्हारा पत्र पाकर और यह जानकर कि तुम जिला स्कूल में भरती हो गए हो, मैं बहुत खुश हूँ। मुझे आशा है कि स्कूल के प्रथम दिन का तुम्हारा अनुभव बड़ा मधुर होगा। फिर भी, मैं तुम्हें खतरों से सचेत करने के लिए यह पत्र लिख रहा हूँ। स्कूल में जिस तरह बहुत-से अच्छे लड़के है, उसी तरह बहुत-से बुरे लड़के हैं। केवल अच्छे लड़कों के साथ तुम्हें रहना चाहिए। इस कार्य में तुम्हारे शिक्षक तुम्हारी सहायता करेंगे। दुष्ट और आलसी लड़कों की संगति से हमेशा दूर रहने की चेष्टा करोगे। अपने पाठ के संबंध में भी तुम्हें सचेत और समयनिष्ठ रहना चाहिए। तुम्हें अपने शिक्षकों को सबसे अधिक सम्मान प्रदर्शित करना चाहिए अन्यथा तुम कुछ सीख नहीं सकोगे। अपने साथियों के साथ तुम्हारा व्यवहार भी भाई की तरह होना चाहिए। मैं आशा करता हूँ कि तुम मेरी हिदायतों पर ध्यान दोगे। अगर तुम ऐसा करोगे तो तुम बहुत अच्छे लड़के बनोगे।

तुम्हारा शुभेच्छुक,
सुरेश मोहन
पता- नरेंद्र मोहन सिन्हा,
वर्ग 10, जिला स्कूल,
मुजफ्फरपुर

अपने मित्र को एक पत्र लिखिए जिसमें मेला देखने का वर्णन कीजिए।

बाँकीपुर,
पटना-4
15 नवंबर, 1987

प्रिय शेखर,

पिछले कई दिनों से मैं तुम्हें पत्र लिखने के लिए सोच रहा था। पर, मुझे सोनपुर मेला देखने की इच्छा थी। इसलिए मैंने जान-बूझकर पत्र लिखने में देर की। मैंने सोचा कि सोनपुर मेले से लौटकर पत्र देना अच्छा होगा ताकि मैं वहाँ के अनुभव का वर्णन कर सकूँ।

सोनपुर का मेला एक बहुत बड़े क्षेत्र में लगता है। मैं समझता हूँ कि यह दुनिया का सबसे बड़ा मेला है। यहाँ सभी तरह के पशु और पक्षी- सबसे छोटे से लेकर सबसे बड़े तक- बेचे जाते है। यहाँ पर अनगिनत दूकानें रहती है और चीजों की अत्यधिक खरीद-बिक्री होती है। सबसे बड़ा बाजार जानवरों का है जहाँ गाय, भैंस, घोड़ा, ऊँट, हाथी इत्यादि बिकते हैं। मेले में बहुत-से होटल, नाटक-मंडली, सर्कस-मंडली इत्यादि रहते है। मेले में बहुत अधिक भीड़ रहती है और हरिहरनाथ के मंदिर में सबसे अधिक भीड़ रहती है।

मेले में संध्या का समय बड़ा दुःखदायी रहता है। बहुत-से लोग एक साथ भोजन बनाते है, इसलिए धुआँ बहुत उठता है। खासकर मैंने पक्षियों के बाजार का अधिक आनंद उठाया; क्योंकि एक ही जगह मैंने हजारों तरह के पक्षियों को देखा। उनमें से बहुतों का मिलना दुर्लभ था और वे बहुत दूर से लाए गए थे।

मेला जाने से मुझे बहुत आनंद हुआ, लेकिन तुम्हारी अनुपस्थिति से दुःख हुआ।

तुम्हारा शुभचिंतक,
रामानुज
पता- श्री शेखर प्रसाद,
मारफत: बाबू नंदकिशोर लाल, वकील
महाजनटोली, आरा।

अपने मित्र को एक पत्र लिखिए जिसमें उसे उसकी सफलता पर बधाई दीजिए।

अशोक रोड,
गया
15 जून, 1988

प्रिय राजीव,

मैंने माध्यमिक विद्यालय परीक्षा में तुम्हारी सफलता के बारे में अभी सुना है। अपनी सफलता पर मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करो।

तुमने दुर्लभ विशिष्टता प्राप्त की है। सभी सफल छात्रों में प्रथम प्राप्त करना सरल काम नहीं है। मुझे विश्र्वास था कि तुम यह विशिष्टता अवश्य प्राप्त करोगे। तुम्हें नियमित रूप से और धैर्यपूर्वक परिश्रम करने के कारण सफलता मिली है। तुमने केवल अपने ही लिए नहीं, बल्कि अपने सभी मित्रों के लिए सम्मान प्राप्त किया है। तुम्हारी सफलता से मुझे प्रेरणा मिलती है। मैं आशा करता हूँ कि तुम भविष्य में इसी प्रकार विशिष्टता प्राप्त करोगे।

अपनी सफलता के उपलक्ष्य में भोज का प्रबंध कब करोगे ? भोज के लिए मुझे निमंत्रण देना नहीं भूलना।

शुभकामनाओं के साथ,
तुम्हारा शुभचिंतक,
रवींद्र
पता- श्री राजीव सिंह,
15 पाटलिपुट कोलोनी,
पटना

आपका मित्र बीमार है। उसे खुश रहने के लिए एक पत्र लिखिए।

गोलकपुर,
पटना-6
16 जनवरी, 1988

प्रिय सुरेश,

तुम्हारी बीमारी के बारे में सुनकर मैं बहुत दुखी हूँ। आज मुझे उमेश का एक पत्र मिला है। उसी से मुझे तुम्हारी बीमारी की जानकारी हुई। मैं वास्तव में तुम्हारे लिए बहुत दुखी हूँ।

उसका कहना है कि तुम बहुत घबरा गए हो। तुम्हें अपने छात्रावास में अकेलापन महसूस होता होगा। मुझे लगता है कि तुम्हारे मित्र तुम्हारी देखभाल अवश्य करते होंगे। अच्छा होता कि तुम्हें अस्पताल में ले जाया जाता।

निराश नहीं होओ। खुश हो जाओ। तुम्हारी बीमारी खतरनाक नहीं है। तुम कुछ ही दिनों में अच्छे हो जाओगे। उदासी का त्याग कर दो। तुम्हें पूरा आराम करना चाहिए। मैं आशा करता हूँ कि तुम्हारे अच्छे होने की खबर जल्दी सुनूँगा।

शुभकामनाओं के साथ,
तुम्हारा प्रिय मित्र,
सतीश
पता- श्री सुरेश कुमार,
कमरा नं० 6,
जिला स्कूल छात्रावास
मुंगेर

अपनी बहन को एक पत्र लिखिए जिसमें अपने स्कूल में गणतंत्र दिवस के समारोह का वर्णन कीजिए।

बाकरगंज,
पटना-4
31 जनवरी, 2005

प्रिय रतन,

बहुत दिनों से मुझे तुम्हारा पत्र नहीं मिला है। मुझे दुःख है कि मैं तुम्हें पहले पत्र नहीं लिख सका, क्योंकि मैं अपने स्कूल के गणतंत्र-दिवस-समारोह की तैयारी में व्यस्त था। मैं सोचता हूँ कि तुम जानना चाहोगी कि हमलोगों ने अपने स्कूल में गणतंत्र दिवस कैसे मनाया।

गणतंत्र दिवस को सभी शिक्षक और छात्र सुबह में स्कूल के अहाते में एकत्र हुए। हमारे स्कूल के प्रधानाध्यापक ने 8 बजे सुबह में राष्ट्रीय झंडा फहराया। हमलोगों ने राष्ट्रीय गीत गाया। तब एन०सी० के लड़कों ने राष्ट्रीय झंडा को सलामी दी। हमारे प्रधानाध्यापक और अन्य शिक्षकों ने गणतंत्र दिवस के महत्त्व पर भाषण दिया।

रात में हमलोगों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया। स्कूल के मकान को प्रकाशित किया गया। वह बहुत सुंदर लगता था। हमलोगों ने एक नाटक प्रस्तुत किया। दर्शकों ने इसकी प्रशंसा की। हमारा सांस्कृतिक कार्यक्रम वस्तुतः बहुत सफल हुआ। इस प्रकार हमलोगों ने अत्यंत उत्साह के साथ अपने स्कूल में गणतंत्र दिवस मनाया।

शुभकामनाओं के साथ,
तुम्हारा शुभचिंतक,
मुकुल
पता- सुश्री सुभाषिनी शरण,
मारफत- श्री प्रमोद शरण,
लालगंज,
आरा।

अपने मित्र को एक पत्र में अपने स्कूल में हुए एक आनंददायक उत्सव के बारे में लिखिए।

पार्क रोड,
जमशेदपुर,
17 फरवरी, 1999

प्रिय प्रभात,

मुझे एक महीने से तुम्हारा कोई पत्र नहीं मिला है। हाल में मेरे स्कूल में एक आनंददायक उत्सव हुआ था। मैं सोचता हूँ कि तुम उसके बारे में सुनना चाहोगे।

इस वर्ष मेरे स्कूल में पारितोषिक-वितरण समारोह 15 फरवरी को हुआ था। एक सप्ताह पहले ही इसकी तैयारियाँ शुरू हो गई। हमलोगों ने गाने के लिए कुछ कविताओं और गीतों को चुना। हमलोगों ने एक नाटक खेलने का निश्र्चय किया। नाटक में भाग लेने के लिए कुछ लड़कों को चुना गया। छात्रों के अभिभावकों और शहर के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को निमंत्रणपत्र भेजे गए।

पारितोषिक-वितरण के दिन स्कूल के मकान को सजाया गया। स्कूल के प्रांगण में एक बड़ा शामियाना लगाया गया। उत्सव 3 बजे अपराह्न से शुरू होनेवाला था, लेकिन छात्र समय से बहुत पहले जमा होने लगे। मुख्य द्वार पर मुख्य अतिथि का हार्दिक स्वागत किया गया। उनको मंच पर ले जाया गया। तब एक गीत से उत्सव शुरू हुआ। हमारे स्कूल के प्रधानाध्यापक ने स्कूल की प्रगति के बारे में एक रिपोर्ट पढ़ी। उनके भाषण के बाद कविताएँ और गीत गाए गए। तब एक छोटा नाटक प्रस्तुत किया गया।

जब नाटक समाप्त हो गया, तब मुख्य अतिथि ने पारितोषिक बाँटा। तत्पश्र्चात उन्होंने एक संक्षिप्त भाषण दिया जिसमें उन्होंने हमलोगों को बहुत अच्छे सुझाव दिए। धन्यवाद-ज्ञापन के साथ उत्सव समाप्त हो गया।

हमलोगों ने उत्सव से बहुत आनन्द उठाया। तुम्हें यह जानकर प्रसन्नता होगी कि मुझे कई पारितोषिक मिले।

तुम्हारा शुभचिंतक,
राकेश
पता- श्री प्रभात कुमार,
54 गर्दनीबाग,
पटना