Patra-lekhan(Lette-writing)-(पत्र-लेखन)


पत्र-लेखन (Letter-writing) की परिभाषा

दूर रहने वाले अपने सबन्धियों अथवा मित्रों की कुशलता जानने के लिए तथा अपनी कुशलता का समाचार देने के लिए पत्र एक साधन है। इसके अतिरिक्त्त अन्य कार्यों के लिए भी पत्र लिखे जाते है।

पत्र का महत्व

As keys do open chests.
So letters open breasts .

उक्त अँगरेजी विद्वान् के कथन का आशय यह है कि जिस प्रकार कुंजियाँ बक्स खोलती हैं, उसी प्रकार पत्र (letters) ह्रदय के विभित्र पटलों को खोलते हैं। मनुष्य की भावनाओं की स्वाभाविक अभिव्यक्ति पत्राचार से भी होती हैं। निश्छल भावों और विचारों का आदान-प्रदान पत्रों द्वारा ही सम्भव है। पत्रलेखन दो व्यक्तियों के बीच होता है। इसके द्वारा दो हृदयों का सम्बन्ध दृढ़ होता है। अतः पत्राचार ही एक ऐसा साधन है, जो दूरस्थ व्यक्तियों को भावना की एक संगमभूमि पर ला खड़ा करता है और दोनों में आत्मीय सम्बन्ध स्थापित करता है। पति-पत्नी, भाई-बहन, पिता-पुत्र- इस प्रकार के हजारों सम्बन्धों की नींव यह सुदृढ़ करता है। व्यावहारिक जीवन में यह वह सेतु है, जिससे मानवीय सम्बन्धों की परस्परता सिद्ध होती है। अतएव पत्राचार का बड़ा महत्व है।

पत्रलेखन एक कला है

आधुनिक युग में पत्रलेखन को 'कला' की संज्ञा दी गयी है। पत्रों में आज कलात्मक अभिव्यक्तियाँ हो रही है। साहित्य में भी इनका उपयोग होने लगा है। जिस पत्र में जितनी स्वाभाविकता होगी, वह उतना ही प्रभावकारी होगा। एक अच्छे पत्र के लिए कलात्मक सौन्दर्यबोध और अन्तरंग भावनाओं का अभिव्यंजन आवश्यक है। एक पत्र में उसके लेखक की भावनाएँ ही व्यक्त नहीं होती, बल्कि उसका व्यक्तित्व (personality) भी उभरता है। इससे लेखक के चरित्र, दृष्टिकोण, संस्कार, मानसिक स्थिति, आचरण इत्यादि सभी एक साथ झलकते हैं। अतः पत्रलेखन एक प्रकार की कलात्मक अभिव्यक्ति है। लेकिन, इस प्रकार की अभिव्यक्ति व्यवसायिक पत्रों की अपेक्षा सामाजिक तथा साहित्यिक पत्रों में अधिक होती है।

अच्छे पत्र की विशेषताएँ

एक अच्छे पत्र की पाँच विशेषताएँ है-
(1)सरल भाषाशैली
(2)विचारों की सुस्पष्ठता
(3)संक्षेप और सम्पूर्णता
(4)प्रभावान्विति
(5)बाहरी सजावट

(1 )सरल भाषाशैली:- पत्र की भाषा साधारणतः सरल और बोलचाल की होनी चाहिए। शब्दों के प्रयोग में सावधानी रखनी चाहिए। ये उपयुक्त, सटीक, सरल और मधुर हों। सारी बात सीधे-सादे ढंग से स्पष्ट और प्रत्यक्ष लिखनी चाहिए। बातों को घुमा-फिराकर लिखना उचित नहीं।

(2)विचारों की सुस्पष्ठता :-- पत्र में लेखक के विचार सुस्पष्ट और सुलझे होने चाहिए। कहीं भी पाण्डित्य-प्रदर्शन की चेष्टा नहीं होनी चाहिए। बनावटीपन नहीं होना चाहिए। दिमाग पर बल देनेवाली बातें नहीं लिखी जानी चाहिए।

(3)संक्षेप और सम्पूर्णता:-- पत्र अधिक लम्बा नहीं होना चाहिए। वह अपने में सम्पूर्ण और संक्षिप्त हो। उसमें अतिशयोक्ति, वाग्जाल और विस्तृत विवरण के लिए स्थान नहीं है। इसके अतिरिक्त, पत्र में एक ही बात को बार-बार दुहराना एक दोष है। पत्र में मुख्य बातें आरम्भ में लिखी जानी चाहिए। सारी बातें एक क्रम में लिखनी चाहिए। इसमें कोई भी आवश्यक तथ्य छूटने न पाय। पत्र अपने में सम्पूर्ण हो, अधूरा नहीं। पत्रलेखन का सारा आशय पाठक के दिमाग पर पूरी तरह बैठ जाना चाहिए। पाठक को किसी प्रकार की लझन में छोड़ना ठीक नहीं।

(4)प्रभावान्वित:-- पत्र का पूरा असर पढ़नेवाले पर पड़ना चाहिए। आरम्भ और अन्त में नम्रता और सौहार्द के भाव होने चाहिए।

(5)बाहरी सजावट:-- पत्र की बाहरी सजावट से हमारा तात्पर्य यह है कि
(i) उसका कागज सम्भवतः अच्छा-से-अच्छा होना चाहिए;
(ii) लिखावट सुन्दर, साफ और पुष्ट हो;
(iii) विरामादि चिह्नों का प्रयोग यथास्थान किया जाय;
(iv) शीर्षक, तिथि, अभिवादन, अनुच्छेद और अन्त अपने-अपने स्थान पर क्रमानुसार होने चाहिए;
(v) पत्र की पंक्तियाँ सटाकर न लिखी जायँ और
(vi) विषय-वस्तु के अनुपात से पत्र का कागज लम्बा-चौड़ा होना चाहिए।

पत्रों के प्रकार

(1)सामाजिक पत्र (Social letters)
(2)व्यापारिक पत्र (Commercial letters)
(3)सरकारी पत्र (Official letters)

(1 )सामाजिक पत्र (Social letters):- ये पत्र अपने मित्रों,सगे-सम्बन्धियों एवं परिचितों को लिखे जाते है। इसके अतिरिक्त सुख-दुःख, शोक, विदाई तथा निमन्त्रण आदि के लिए जो पत्र लिखे जाते हैं, वे भी 'सामाजिक पत्र' कहलाते हैं।

पत्रलेखन सभ्य समाज की एक कलात्मक देन है। मनुष्य चूँकि सामाजिक प्राणी है इसलिए वह दूसरों के साथ अपना सम्बन्ध किसी-न-किसी माध्यम से बनाये रखना चाहता है। मिलते-जुलते रहने पर पत्रलेखन की तो आवश्यकता नहीं होती, पर एक-दूसरे से दूर रहने पर एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के पास पत्र लिखता है। सरकारी पत्रों की अपेक्षा सामाजिक पत्रों में कलात्मकता अधिक रहती है; क्योंकि इनमें मनुष्य के ह्रदय के सहज उद्गार व्यक्त होते है। इन पत्रों को पढ़कर हम किसी भी व्यक्ति के अच्छे या बुरे स्वभाव या मनोवृति का परिचय आसानी से पा सकते है।

(2)व्यापारिक पत्र (Commercial letters) :-- व्यापार में सामान खरीदने व बेचने अथवा रुपयों के लेन-देन के लिए जो पत्र लिखे जाते हैं, उन्हें 'व्यापारिक पत्र' कहते हैं।

(3)सरकारी पत्र (Official letters):-- जिन पत्रों में निवेदन अथवा प्रार्थना की जाती है, वे 'प्रार्थना-पत्र' कहलाते हैं। इस सम्बन्ध में जो पत्र सरकारी काम-काज के लिए लिखे जाते हैं, वे ' सरकारी पत्र' कहलाते हैं।
ये सरकारी अफसरों या अधिकारियों, स्कूल और कॉलेज के प्रधानाध्यापकों और प्राचार्यों को लिखे जाते हैं।

एक अच्छे सामाजिक पत्र में सौजन्य, सहृदयता और शिष्टता का होना आवश्यक है। तभी इस प्रकार के पत्रों का अभीष्ट प्रभाव हृदय पर पड़ता है।
इसके कुछ औपचारिक नियमों का निर्वाह करना चाहिए।
(i) पहली बात यह कि पत्र के ऊपर दाहिनी ओर पत्रप्रेषक का पता और दिनांक होना चाहिए।
(ii) दूसरी बात यह कि पत्र जिस व्यक्ति को लिखा जा रहा हो- जिसे 'प्रेषिती' भी कहते हैं- उसके प्रति, सम्बन्ध के अनुसार ही समुचित अभिवादन या सम्बोधन के शब्द लिखने चाहिए।
(iv) यह पत्रप्रेषक और प्रेषिती के सम्बन्ध पर निर्भर है कि अभिवादन का प्रयोग कहाँ, किसके लिए, किस तरह किया जाय।
(v) अँगरेजी में प्रायः छोटे-बड़े सबके लिए 'My dear' का प्रयोग होता है, किन्तु हिन्दी में ऐसा नहीं होता।
(vi) पिता को पत्र लिखते समय हम प्रायः 'पूज्य पिताजी' लिखते हैं।
(vii) शिक्षक अथवा गुरुजन को पत्र लिखते समय उनके प्रति आदरभाव सूचित करने के लिए 'आदरणीय' या 'श्रद्धेय'-जैसे शब्दों का व्यवहार करते हैं।
(viii) यह अपने-अपने देश के शिष्टाचार और संस्कृति के अनुसार चलता है।
(ix) अपने से छोटे के लिए हम प्रायः 'प्रियवर', 'चिरंजीव'-जैसे शब्दों का उपयोग करते हैं।

इस प्रकार, पत्र में वक्तव्य के पूर्व (1) सम्बोधन, (2)अभिवादन औरवक्तव्य के अन्त में (3) अभिनिवेदन का, सम्बन्ध के आधार अलग-अलग ढंग होता है। इनके रूप इस प्रकार हैं-

सम्बन्ध सम्बोधन अभिवादन अभिनिवेदन
पिता-पुत्र प्रिय अनिल शुभाशीर्वाद तुम्हारा शुभाकांक्षी
पुत्र-पिता पूज्य पिताजी सादर प्रणाम आपका स्त्रेहाकांक्षी
माता-पुत्र प्रिय पुत्र शुभाशीष तुम्हारी शुभाकांक्षिणी
पुत्र-माता पूजनीया माताजी सादर प्रणाम आपका स्त्रेहाकांक्षी
मित्र-मित्र प्रिय भाई या मित्र या प्रिय रमेश आदि प्रसत्र रहो आदि तुम्हारा .......
गुरु-शिष्य प्रिय कुमार या चिo कुमार शुभाशीर्वाद तुम्हारा सत्यैषी या शुभचिन्तक
शिष्य-गुरु श्रद्धेय या आदरणीय गुरुदेव सादर प्रणाम आपका शिष्य
दो अपरिचित व्यक्ति प्रिय महोदय सप्रेम नमस्कार भवदीय
अग्रज-अनुज प्रिय सुरेश शुभाशीर्वाद तुम्हारा शुभाकांक्षी
अनुज-अग्रज पूज्य भैया या भ्राता जी प्रणाम आपका स्त्रेहाकांक्षी
स्त्री-पुरुष (अनजान) प्रिय महाशय ....... भवदीया
पुरुष-स्त्री (अनजान) प्रिय महाशया ....... भवदीय
पुरुष-स्त्री (परिचित) कुमारी कमलाजी ....... भवदीय
स्त्री-पुरुष (परिचित) भाई कमलजी ....... भवदीया
पति-पत्नी प्रिये या प्राणाधिके शुभाशीर्वाद तुम्हारा सत्यैषी
पत्नी-पति मेरे सर्वस्व,प्राणाधान सादर प्रणाम आपकी स्त्रेहाकांक्षिणी
छात्र-प्रधानाध्यापक मान्य महोदय प्रणाम आपका आज्ञाकारी छात्र

पत्र लिखने के लिए कुछ आवश्यक बातें
(1) जिसके लिए पत्र लिखा जाये, उसके लिए पद के अनुसार शिष्टाचारपूर्ण शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।
(2) पत्र में हृदय के भाव स्पष्ट रूप से व्यक्त होने चाहिए।
(3) पत्र की भाषा सरल एवं शिष्ट होनी चाहिए।
(4) पत्र में बेकार की बातें नहीं लिखनी चाहिए। उसमें केवल मुख्य विषय के बारे में ही लिखना चाहिए।
(5) पत्र में आशय व्यक्त करने के लिए छोटे वाक्यों का प्रयोग करना चाहिए।
(6) पत्र लिखने के पश्चात उसे एक बार अवश्य पढ़ना चाहिए।

(1)सामाजिक पत्रों के नमूने

(i) रुपये की सहायता के लिए मित्र को लिखा गया पत्र-
............................................................................. जॉर्ज टाउन,
............................................................................. इलाहाबाद
............................................................................. 12-11-1992

प्रिय मित्र,
नमस्कार।

मैंने अपने पिताजी को 4 नवंबर तक मासिक खर्च भेज देने को लिखा था, किंतु वह मुझे अभी तक नहीं मिला है। ऐसा लगता है कि पिताजी घर पर नहीं है, अवश्य कहीं दौरे पर गये हुए हैं। संभव है, मेरे रुपये एक सप्ताह बाद आयें।

अतः अनुरोध है कि काम चलाने के लिए कम-से-कम दस रुपये मुझे भेजकर तुम मेरी सहायता करो। मेरे रुपये ज्यों ही आ जायेंगे, तुम्हें लौटा दूँगा। आशा है, इस मौके पर तुम मेरी अवश्य ही सहायता करोगे। तुम्हारे पत्र की प्रतीक्षा में हूँ।

भवदीय,
अनिल कुमार

पता-
श्री सुरेश गणपति,
रायगढ़, वाराणसी

(ii) परीक्षा की तैयारी के संबंध में मित्र को लिखा गया पत्र- ............................................................................. मयूर बिहार,
............................................................................. दिल्ली
............................................................................. 12-11-1999

प्रिय सुंदर,
नमस्ते।

बहुत दिनों से तुम्हारा पत्र मुझे नहीं मिला। आशा है, तुम मजे में हो। यहाँ मैं इन दिनों परीक्षा की तैयारी में हूँ। दस दिन बाद वार्षिक परीक्षा आरंभ होने जा रही है। घूमना-फिरना बंद है। मित्रों से भी भेंट नहीं होती। मुझे खासकर अँगरेजी से डर लगता है। इसलिए इस विषय की तैयारी में मुझे अधिक समय लगाना पड़ता है। इसके बाद अंकगणित को अधिक समय देता हूँ। मेरा गणित भी बहुत अच्छा नहीं है। फिर भी, इसमें पास कर जाने की पूरी उम्मीद है। देखें, क्या फल निकलता है। तुम्हारी तैयारी कैसी है, लिखना। अपने माता-पितजी को मेरा सादर प्रणाम।

तुम्हारा अभिन्न मित्र,
रमेश कुमार

पता-
श्री सुंदरराम,
पुनाईचक,पटना-1

(2)व्यावसायिक पत्र का नमूना

(i)पुस्तक मँगाने के लिए प्रकाशक को लिखा गया पत्र- ............................................................................. वासुदेवपुर,
............................................................................. मुँगेर
............................................................................. 22-2-2001

सेवा में,
महोदय,

मुझे मालूम हुआ है कि आपके यहाँ से 'सरल हिंदी लेख' नामक पुस्तक का प्रकाशन हुआ है, जो विद्यार्थियों के लिए उपयोगी है। मुझे इसकी एक प्रति चाहिए। बड़ी कृपा होगी यदि इस पुस्तक की एक प्रति वी० पी० पी० से मेरे नाम भेज देने का कष्ट करें। आपको विश्र्वास दिलाता हूँ कि मैं वी० पी० पी० अवश्य छुड़ा लूँगा। धन्यवाद।

आपका विश्र्वासी,
अशोक कुमार

मेरा पता-
अशोक कुमार ,
स्थान-पोस्ट-वासुदेवपुर
रेलवे-स्टेशन-पूरब सराय (मुँगेर)

(3)आधिकारिक पत्र का नमूना

(i)स्कूल फीस माफ कराने के लिए प्रधानाध्यापक को लिखा गया पत्र -

श्रीमान् प्रधानाध्यापकजी,
न्यू मिड्ल स्कूल,रायपुर।
मान्य महोदय,

सविनय निवेदन है कि मैं आपके स्कूल में सातवें वर्ग का एक बहुत ही निर्धन छात्र हूँ। मेरे पिताजी की मासिक आमदनी इतनी भी नहीं कि घर का सारा खर्च चल सके; स्कूल फीस देना तो दूर की बात है। मेरे पिताजी एक अपर प्राइमरी स्कूल में शिक्षक का काम करते हैं। मेरे अलावा घर में पाँच भाई-बहन भी है, जिनकी पढ़ाई का सारा भार मेरे पिताजी पर ही है। ऐसी हालत में उनके लिए मेरी पढ़ाई का बोझ उठाना कठिन है। महँगाई से तो हम और परेशान हैं। अतः सादर प्रार्थना है कि आप मेरी, मेरे पिताजी की और परिवार की वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखकर मेरी स्कूल फीस माफ कर दें ताकि मैं निश्रित होकर पढ़ाई जारी रख सकूँ। इस कृपा के लिए मैं आपका सदा आभारी रहूँगा।

आपका आज्ञाकारी छात्र,
विवेक कुमार

(ii)विवाह पर अवकाश के लिए प्रार्थना-पत्र -

सेवा में,
श्रीमान प्रधानाचार्य महोदय,
नवशान्ति पब्लिक स्कूल
दिल्ली रोड, मुरादाबाद

मान्यवर महोदय,
सविनय निवेदन यह है कि मेरी बड़ी बहिन का विवाह। ........ को होना निश्चित हुआ है। काम करने के लिए मेरा रहना आवश्यक है। इसलिए मुझे दिनांक......... से......... तक का तीन दिन का अवकाश प्रदान करने की कृपा करें।

सधन्यवाद।

आपका आज्ञाकारी शिष्य
लोकेश
कक्षा-चतुर्थ-बी
दिनांक: .........