Patra-lekhan(Letter-writing)-(पत्र-लेखन)


(4) छात्रवृत्ति के लिए प्रधानाचार्य को प्रार्थना-पत्र लिखिए।

प्रधानाचार्य महोदय,
दिल्ली पब्लिक स्कूल,
जनकपुरी,
नई दिल्ली-110057

विषय : छात्रवृत्ति हेतु प्रार्थना-पत्र।

माननीय महोदय,
सविनय निवेदन यह है कि मैं आपके विद्यालय में कक्षा सातवीं 'बी' की छात्रा हूँ। मेरे पिता जी की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। वे विद्यालय के शुल्क तथा अन्य व्ययों का भार उठा पाने में असमर्थ हैं। मैं अपनी पिछली कक्षाओं में प्रथम स्थान प्राप्त करती रही हूँ तथा खेल-कूद व अन्य प्रतियोगिताओं में भी मैंने अनेक पदक प्राप्त किए हैं।

कृपया मुझे विद्यालय के छात्रवृत्ति-कोष से छात्रवृत्ति प्रदान करने का कष्ट करें, ताकि मैं अपनी पढ़ाई जारी रख सकूँ। मैं सदैव आपकी आभारी रहूँगी।
सधन्यवाद।

आपकी आज्ञाकारी शिष्या,
निकिता
सातवीं 'बी'
दिनांक : 02 जुलाई, 20XX

(5) विद्यालय में पीने के पानी की उचित व्यवस्था करवाने के लिए प्रधानाचार्या को प्रार्थना-पत्र लिखिए।

प्रधानाचार्या महोदय,
केंद्रीय विद्यालय,
दिल्ली कैंट,
नई दिल्ली।

विषय : पीने के पानी की उचित व्यवस्था हेतु पत्र।

महोदय,
सविनय निवेदन यह है कि हम आपके विद्यालय की 'सातवीं' कक्षा के छात्र एवं छात्राएँ हैं। हम आपका ध्यान विद्यालय में पीने के पानी की व्यवस्था की ओर आकर्षित करना चाहते हैं। विद्यालय में सरकारी जल-आपूर्ति विभाग की सप्लाई का पानी आता है, जिसे टंकियों में इकट्ठा किया जाता है। कई महीनों से उन टंकियों की सफाई नहीं हुई है, इसलिए हमें बहुत गंदा पानी पीने के लिए मिल रहा है। गंदा पानी पीने के कारण कई छात्रों को पेट में दर्द, उल्टी व पीलिया आदि का शिकार होना पड़ा है। गर्मी का मौसम होने के कारण हमें यह पानी पीना ही पड़ता है, क्योंकि घर से लाया गया पानी जल्दी ही समाप्त हो जाता है।

आपसे अनुरोध है कि पानी की टंकियों की नियमित सफाई करवाई जाए तथा गर्मियों के लिए 'वाटर कूलर' तथा 'एक्वागार्ड' की व्यवस्था की जाए, ताकि हमें साफ व ठंडा पानी पीने के लिए मिल सके। आशा है, आप हमारे अनुरोध पर अवश्य ध्यान देंगी व जल्दी ही उचित कदम उठाएँगा।

धन्यवाद सहित।
आपके आज्ञाकारी छात्र व छात्राएँ,
हस्ताक्षर
कक्षा-सातवीं
दिनांक : 12 जुलाई, 20XX

(6) अपने क्षेत्र में बढ़ते अपराधों की समस्या के बारे में बताते हुए थानाध्यक्ष को पत्र लिखिए।

सी 4, विकासपुरी,
नई दिल्ली।
दिनांक : 26 जुलाई, 20XX
थानाध्यक्ष,
विकासपुरी,
नई दिल्ली।

विषय : बढ़ते हुए अपराधों की समस्या के समाधान हेतु पत्र।

मान्यवर,
मैं विकासपुरी क्षेत्र में लगातार बढ़ रहे अपराधों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। पिछले दो-तीन महीनों में हमारे क्षेत्र में चार चोरियाँ व दो हत्याएँ हो चुकी हैं। छोटी-मोटी राहजनी की घटनाएँ तो अब आम हो गई हैं। राह चलती महिलाओं के पर्स, चेन आदि मोटरसाइकिल सवार दिन-दहाड़े लूटकर ले जाते हैं। पुलिस की गश्त करने वाली वैन सड़क पर दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती। सिपाही गश्त पर नहीं आते। इस वजह से अपराधियों के हौसले दिन-प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे हैं।

अतः आपसे अनुरोध है कि इन अपराधों की रोकथाम के लिए जल्द-से-जल्द कार्यवाही करें, ताकि इस क्षेत्र के निवासी निश्चित होकर जी सकें और सड़कों पर चल सकें। आशा है कि आप मेरे अनुरोध पर ध्यान देंगे और कोई कड़ा कदम उठाएँगे।
धन्यवाद।

भवदीय,
विष्णु पाठक

(7) आपके पिता जी ने आपको दो सप्ताह पहले मनीऑर्डर भेजा था, जो आपको नहीं मिला। शिकायत करते हुए क्षेत्र के पोस्टमास्टर को पत्र लिखिए।

सी-51, सुशांतलोक,
गुड़गांव।
दिनांक : 8 जून, 20XX
पोस्टमास्टर साहब,
सुशांतलोक, गुड़गांव।

विषय : मनीऑर्डर प्राप्त न होने पर शिकायती-पत्र।

मान्यवर,
मेरे पिता जी ने दिल्ली से 24 मई, 20XX को आठ सौ रुपये का मनीऑर्डर भेजा था, जिसकी रसीद संख्या XXX है। आज दो सप्ताह बीत जाने पर भी मुझे वह मनीऑर्डर नहीं मिला है। इस कारण मुझे बहुत असुविधा हो रही है, क्योंकि वे रुपये मेरी नई पुस्तकें खरीदने के लिए थे।

अतः आपसे निवेदन है कि इसकी तुरंत जाँच करवाएँ और मुझे जल्द-से-जल्द मनीऑर्डर दिलवाने की कृपा करें। आशा है, आप शीघ्र ही इस दिशा में उचित कदम उठाएँगे।
सधन्यवाद।

निवेदक,
ऋषभ वर्मा

(2)अनौपचारिक-पत्र

अनौपचारिक पत्र अपने मित्रों, सगे-सम्बन्धियों एवं परिचितों को लिखे जाते है। इसके अतिरिक्त सुख-दुःख, शोक, विदाई तथा निमन्त्रण आदि के लिए पत्र लिखे जाते हैं, इसलिए इन पत्रों में मन की भावनाओं को प्रमुखता दी जाती है, औपचारिकता को नहीं। इसके अंतर्गत पारिवारिक या निजी-पत्र आते हैं।

पत्रलेखन सभ्य समाज की एक कलात्मक देन है। मनुष्य चूँकि सामाजिक प्राणी है इसलिए वह दूसरों के साथ अपना सम्बन्ध किसी-न-किसी माध्यम से बनाये रखना चाहता है। मिलते-जुलते रहने पर पत्रलेखन की तो आवश्यकता नहीं होती, पर एक-दूसरे से दूर रहने पर एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के पास पत्र लिखता है।

सरकारी पत्रों की अपेक्षा सामाजिक पत्रों में कलात्मकता अधिक रहती है; क्योंकि इनमें मनुष्य के ह्रदय के सहज उद्गार व्यक्त होते है। इन पत्रों को पढ़कर हम किसी भी व्यक्ति के अच्छे या बुरे स्वभाव या मनोवृति का परिचय आसानी से पा सकते है।

एक अच्छे सामाजिक पत्र में सौजन्य, सहृदयता और शिष्टता का होना आवश्यक है। तभी इस प्रकार के पत्रों का अभीष्ट प्रभाव हृदय पर पड़ता है।
इसके कुछ औपचारिक नियमों का निर्वाह करना चाहिए।

(i) पहली बात यह कि पत्र के ऊपर दाहिनी ओर पत्रप्रेषक का पता और दिनांक होना चाहिए।

(ii) दूसरी बात यह कि पत्र जिस व्यक्ति को लिखा जा रहा हो- जिसे 'प्रेषिती' भी कहते हैं- उसके प्रति, सम्बन्ध के अनुसार ही समुचित अभिवादन या सम्बोधन के शब्द लिखने चाहिए।

(iii) यह पत्रप्रेषक और प्रेषिती के सम्बन्ध पर निर्भर है कि अभिवादन का प्रयोग कहाँ, किसके लिए, किस तरह किया जाय।

(iv) अँगरेजी में प्रायः छोटे-बड़े सबके लिए 'My dear' का प्रयोग होता है, किन्तु हिन्दी में ऐसा नहीं होता।

(v) पिता को पत्र लिखते समय हम प्रायः 'पूज्य पिताजी' लिखते हैं।

(vi) शिक्षक अथवा गुरुजन को पत्र लिखते समय उनके प्रति आदरभाव सूचित करने के लिए 'आदरणीय' या 'श्रद्धेय'-जैसे शब्दों का व्यवहार करते हैं।

(vii) यह अपने-अपने देश के शिष्टाचार और संस्कृति के अनुसार चलता है।

(viii) अपने से छोटे के लिए हम प्रायः 'प्रियवर', 'चिरंजीव'-जैसे शब्दों का उपयोग करते हैं।

इस प्रकार, पत्र में वक्तव्य के पूर्व (1) सम्बोधन, (2)अभिवादन औरवक्तव्य के अन्त में (3) अभिनिवेदन का, सम्बन्ध के आधार अलग-अलग ढंग होता है। इनके रूप इस प्रकार हैं-

सम्बन्ध सम्बोधन अभिवादन अभिनिवेदन
पिता-पुत्र प्रिय अनिल शुभाशीर्वाद तुम्हारा शुभाकांक्षी
पुत्र-पिता पूज्य पिताजी सादर प्रणाम आपका स्त्रेहाकांक्षी
माता-पुत्र प्रिय पुत्र शुभाशीष तुम्हारी शुभाकांक्षिणी
पुत्र-माता पूजनीया माताजी सादर प्रणाम आपका स्त्रेहाकांक्षी
मित्र-मित्र प्रिय भाई या मित्र या प्रिय रमेश आदि प्रसत्र रहो आदि तुम्हारा .......
गुरु-शिष्य प्रिय कुमार या चिo कुमार शुभाशीर्वाद तुम्हारा सत्यैषी या शुभचिन्तक
शिष्य-गुरु श्रद्धेय या आदरणीय गुरुदेव सादर प्रणाम आपका शिष्य
दो अपरिचित व्यक्ति प्रिय महोदय सप्रेम नमस्कार भवदीय
अग्रज-अनुज प्रिय सुरेश शुभाशीर्वाद तुम्हारा शुभाकांक्षी
अनुज-अग्रज पूज्य भैया या भ्राता जी प्रणाम आपका स्त्रेहाकांक्षी
स्त्री-पुरुष (अनजान) प्रिय महाशय ....... भवदीया
पुरुष-स्त्री (अनजान) प्रिय महाशया ....... भवदीय
पुरुष-स्त्री (परिचित) कुमारी कमलाजी ....... भवदीय
स्त्री-पुरुष (परिचित) भाई कमलजी ....... भवदीया
पति-पत्नी प्रिये या प्राणाधिके शुभाशीर्वाद तुम्हारा सत्यैषी
पत्नी-पति मेरे सर्वस्व,प्राणाधान सादर प्रणाम आपकी स्त्रेहाकांक्षिणी
छात्र-प्रधानाध्यापक मान्य महोदय प्रणाम आपका आज्ञाकारी छात्र

अनौपचारिक-पत्र लिखते समय ध्यान रखने योग्य बातें :

(i) भाषा सरल व स्पष्ट होनी चाहिए।

(ii) संबंध व आयु के अनुकूल संबोधन, अभिवादन व पत्र की भाषा होनी चाहिए।

(iii) पत्र में लिखी बात संक्षिप्त होनी चाहिए

(iv) पत्र का आरंभ व अंत प्रभावशाली होना चाहिए।

(v) भाषा और वर्तनी-शुद्ध तथा लेख-स्वच्छ होना चाहिए।

(vi) पत्र प्रेषक व प्रापक वाले का पता साफ व स्पष्ट लिखा होना चाहिए।

(vii) कक्षा/परीक्षा भवन से पत्र लिखते समय अपने नाम के स्थान पर क० ख० ग० तथा पते के स्थान पर कक्षा/परीक्षा भवन लिखना चाहिए।

(viii) अपना पता और दिनांक लिखने के बाद एक पंक्ति छोड़कर आगे लिखना चाहिए।

अनौपचारिक-पत्र का प्रारूप

प्रेषक का पता
..................
...................
...................
दिनांक ...................

संबोधन ...................
अभिवादन ...................
पहला अनुच्छेद ................... (कुशलक्षेम)...................
दूसरा अनुच्छेद ...........(विषय-वस्तु-जिस बारे में पत्र लिखना है)............
तीसरा अनुच्छेद ................ (समाप्ति)................

प्रापक के साथ प्रेषक का संबंध
प्रेषक का नाम ................

अनौपचारिक-पत्र की प्रशस्ति, अभिवादन व समाप्ति

(1) अपने से बड़े आदरणीय संबंधियों के लिए :

प्रशस्ति - आदरणीय, पूजनीय, पूज्य, श्रद्धेय आदि।
अभिवादन - सादर प्रणाम, सादर चरणस्पर्श, सादर नमस्कार आदि।
समाप्ति - आपका बेटा, पोता, नाती, बेटी, पोती, नातिन, भतीजा आदि।

(2) अपने से छोटों या बराबर वालों के लिए :

प्रशस्ति - प्रिय, चिरंजीव, प्यारे, प्रिय मित्र आदि।
अभिवादन - मधुर स्मृतियाँ, सदा खुश रहो, सुखी रहो, आशीर्वाद आदि।
समाप्ति - तुम्हारा, तुम्हारा मित्र, तुम्हारा हितैषी, तुम्हारा शुभचिंतक आदि।

अनौपचारिक पत्रों के उदाहरण

(1) रुपये की सहायता के लिए मित्र को लिखा गया पत्र

जॉर्ज टाउन,
इलाहाबाद
12-11-1992

प्रिय मित्र,
नमस्कार।
मैंने अपने पिताजी को 4 नवंबर तक मासिक खर्च भेज देने को लिखा था, किंतु वह मुझे अभी तक नहीं मिला है। ऐसा लगता है कि पिताजी घर पर नहीं है, अवश्य कहीं दौरे पर गये हुए हैं। संभव है, मेरे रुपये एक सप्ताह बाद आयें।

अतः अनुरोध है कि काम चलाने के लिए कम-से-कम दस रुपये मुझे भेजकर तुम मेरी सहायता करो। मेरे रुपये ज्यों ही आ जायेंगे, तुम्हें लौटा दूँगा। आशा है, इस मौके पर तुम मेरी अवश्य ही सहायता करोगे। तुम्हारे पत्र की प्रतीक्षा में हूँ।

भवदीय,
अनिल कुमार
पता-
श्री सुरेश गणपति,
रायगढ़, वाराणसी