Patra-lekhan(Letter-writing)-(पत्र-लेखन)


अपने मित्र को एक पत्र लिखिए जिसमें उसे उसकी सफलता पर बधाई दीजिए।

अशोक रोड,
गया
15 जून, 1988

प्रिय राजीव,

मैंने माध्यमिक विद्यालय परीक्षा में तुम्हारी सफलता के बारे में अभी सुना है। अपनी सफलता पर मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करो।

तुमने दुर्लभ विशिष्टता प्राप्त की है। सभी सफल छात्रों में प्रथम प्राप्त करना सरल काम नहीं है। मुझे विश्र्वास था कि तुम यह विशिष्टता अवश्य प्राप्त करोगे। तुम्हें नियमित रूप से और धैर्यपूर्वक परिश्रम करने के कारण सफलता मिली है। तुमने केवल अपने ही लिए नहीं, बल्कि अपने सभी मित्रों के लिए सम्मान प्राप्त किया है। तुम्हारी सफलता से मुझे प्रेरणा मिलती है। मैं आशा करता हूँ कि तुम भविष्य में इसी प्रकार विशिष्टता प्राप्त करोगे।

अपनी सफलता के उपलक्ष्य में भोज का प्रबंध कब करोगे ? भोज के लिए मुझे निमंत्रण देना नहीं भूलना।

शुभकामनाओं के साथ,
तुम्हारा शुभचिंतक,
रवींद्र
पता- श्री राजीव सिंह,
15 पाटलिपुट कोलोनी,
पटना

आपका मित्र बीमार है। उसे खुश रहने के लिए एक पत्र लिखिए।

गोलकपुर,
पटना-6
16 जनवरी, 1988

प्रिय सुरेश,

तुम्हारी बीमारी के बारे में सुनकर मैं बहुत दुखी हूँ। आज मुझे उमेश का एक पत्र मिला है। उसी से मुझे तुम्हारी बीमारी की जानकारी हुई। मैं वास्तव में तुम्हारे लिए बहुत दुखी हूँ।

उसका कहना है कि तुम बहुत घबरा गए हो। तुम्हें अपने छात्रावास में अकेलापन महसूस होता होगा। मुझे लगता है कि तुम्हारे मित्र तुम्हारी देखभाल अवश्य करते होंगे। अच्छा होता कि तुम्हें अस्पताल में ले जाया जाता।

निराश नहीं होओ। खुश हो जाओ। तुम्हारी बीमारी खतरनाक नहीं है। तुम कुछ ही दिनों में अच्छे हो जाओगे। उदासी का त्याग कर दो। तुम्हें पूरा आराम करना चाहिए। मैं आशा करता हूँ कि तुम्हारे अच्छे होने की खबर जल्दी सुनूँगा।

शुभकामनाओं के साथ,
तुम्हारा प्रिय मित्र,
सतीश
पता- श्री सुरेश कुमार,
कमरा नं० 6,
जिला स्कूल छात्रावास
मुंगेर

अपनी बहन को एक पत्र लिखिए जिसमें अपने स्कूल में गणतंत्र दिवस के समारोह का वर्णन कीजिए।

बाकरगंज,
पटना-4
31 जनवरी, 2005

प्रिय रतन,

बहुत दिनों से मुझे तुम्हारा पत्र नहीं मिला है। मुझे दुःख है कि मैं तुम्हें पहले पत्र नहीं लिख सका, क्योंकि मैं अपने स्कूल के गणतंत्र-दिवस-समारोह की तैयारी में व्यस्त था। मैं सोचता हूँ कि तुम जानना चाहोगी कि हमलोगों ने अपने स्कूल में गणतंत्र दिवस कैसे मनाया।

गणतंत्र दिवस को सभी शिक्षक और छात्र सुबह में स्कूल के अहाते में एकत्र हुए। हमारे स्कूल के प्रधानाध्यापक ने 8 बजे सुबह में राष्ट्रीय झंडा फहराया। हमलोगों ने राष्ट्रीय गीत गाया। तब एन०सी० के लड़कों ने राष्ट्रीय झंडा को सलामी दी। हमारे प्रधानाध्यापक और अन्य शिक्षकों ने गणतंत्र दिवस के महत्त्व पर भाषण दिया।

रात में हमलोगों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया। स्कूल के मकान को प्रकाशित किया गया। वह बहुत सुंदर लगता था। हमलोगों ने एक नाटक प्रस्तुत किया। दर्शकों ने इसकी प्रशंसा की। हमारा सांस्कृतिक कार्यक्रम वस्तुतः बहुत सफल हुआ। इस प्रकार हमलोगों ने अत्यंत उत्साह के साथ अपने स्कूल में गणतंत्र दिवस मनाया।

शुभकामनाओं के साथ,
तुम्हारा शुभचिंतक,
मुकुल
पता- सुश्री सुभाषिनी शरण,
मारफत- श्री प्रमोद शरण,
लालगंज,
आरा।

अपने मित्र को एक पत्र में अपने स्कूल में हुए एक आनंददायक उत्सव के बारे में लिखिए।

पार्क रोड,
जमशेदपुर,
17 फरवरी, 1999

प्रिय प्रभात,

मुझे एक महीने से तुम्हारा कोई पत्र नहीं मिला है। हाल में मेरे स्कूल में एक आनंददायक उत्सव हुआ था। मैं सोचता हूँ कि तुम उसके बारे में सुनना चाहोगे।

इस वर्ष मेरे स्कूल में पारितोषिक-वितरण समारोह 15 फरवरी को हुआ था। एक सप्ताह पहले ही इसकी तैयारियाँ शुरू हो गई। हमलोगों ने गाने के लिए कुछ कविताओं और गीतों को चुना। हमलोगों ने एक नाटक खेलने का निश्र्चय किया। नाटक में भाग लेने के लिए कुछ लड़कों को चुना गया। छात्रों के अभिभावकों और शहर के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को निमंत्रणपत्र भेजे गए।

पारितोषिक-वितरण के दिन स्कूल के मकान को सजाया गया। स्कूल के प्रांगण में एक बड़ा शामियाना लगाया गया। उत्सव 3 बजे अपराह्न से शुरू होनेवाला था, लेकिन छात्र समय से बहुत पहले जमा होने लगे। मुख्य द्वार पर मुख्य अतिथि का हार्दिक स्वागत किया गया। उनको मंच पर ले जाया गया। तब एक गीत से उत्सव शुरू हुआ। हमारे स्कूल के प्रधानाध्यापक ने स्कूल की प्रगति के बारे में एक रिपोर्ट पढ़ी। उनके भाषण के बाद कविताएँ और गीत गाए गए। तब एक छोटा नाटक प्रस्तुत किया गया।

जब नाटक समाप्त हो गया, तब मुख्य अतिथि ने पारितोषिक बाँटा। तत्पश्र्चात उन्होंने एक संक्षिप्त भाषण दिया जिसमें उन्होंने हमलोगों को बहुत अच्छे सुझाव दिए। धन्यवाद-ज्ञापन के साथ उत्सव समाप्त हो गया।

हमलोगों ने उत्सव से बहुत आनन्द उठाया। तुम्हें यह जानकर प्रसन्नता होगी कि मुझे कई पारितोषिक मिले।

तुम्हारा शुभचिंतक,
राकेश
पता- श्री प्रभात कुमार,
54 गर्दनीबाग,
पटना

आपका मित्र बराबर अध्ययन में लगा रहता है। उसे एक पत्र लिखिए जिसमें उसे खेलकूद में भाग लेने की राय दीजिए।

जिला स्कूल छात्रावास,
आरा
24 फरवरी, 1998

प्रिय अरुण,

बहुत दिनों से मुझे तुम्हारा कोई पत्र नहीं मिला है। मुझे लगता है कि तुम अध्ययन में इतना व्यस्त हो कि तुम पत्र नहीं लिख पाते। मैं जानता हूँ कि तुम अपनी किताबों को पढ़ने में इतना व्यस्त रहते हो कि खेल-कूद में भाग नहीं लेते। यह बहुत खराब है।

क्या तुमने इस कहावत को सुना है, ''बराबर काम करना और कभी नहीं खेलना लड़के को सुस्त बना देता है ?'' इस कहावत में बहुत सचाई है। यदि तुम्हारा स्वास्थ्य खराब रहे तो तुम कोई काम नहीं कर सकते। स्वास्थ्य सबसे बड़ा धन है। यदि तुम्हारा स्वास्थ्य अच्छा नहीं, तो तुम जीवन का आनंद नहीं उठा सकते।

इसलिए मैं तुम्हें खेल-कूद में नियमित रूप से भाग लेने की राय दूँगा। वे बहुत उपयोगी हैं। यदि तुम खेलना शुरू कर दो तो तुम जल्दी ही इसका लाभ महसूस करोगे। तुम कह सकते हो कि खेल-कूद में बहुत समय लगेगा जो तुम अध्ययन में लगा सकते हो। नहीं, तुम गलती कर रहे हो। खेलने में तुम्हारा जो समय लगेगा उससे तुम्हें लाभ होगा।

मैं आशा करता हूँ कि तुम जल्दी ही खेलना शुरू कर दोगे। यदि तुम मेरी राय पर ध्यान नहीं दोगे तो बाद में दुखी होओगे।

शुभकामनाओं के साथ,
तुम्हारा प्रिय मित्र,
मोहन
पता- श्री अरुण कुमार,
सुलतानगंज,
पटना-6

अपने मित्र को एक पत्र लिखिए जिसमें उसे अपने जीवन के उद्देश्य के बारे में बताइए।

स्टेशन रोड,
वैद्यनाथधाम
15 मार्च, 1988

प्रिय राकेश,

मैंने आज तुम्हारा पत्र पाया और मैं इसे पढ़कर बहुत खुश हूँ। तुमने मुझसे पूछा है कि मैं अपने जीवन में क्या करना चाहता हूँ। तुम सोचते हो कि मनुष्य पैसा प्राप्त करने की मशीन है और यही उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। मैं साफ-साफ अवश्य कहूँगा कि मैं तुमसे असहमत हूँ।

मैं समझता हूँ कि जीवन की सार्थकता दूसरे की भलाई करने में है। सच्ची सेवा से दूसरे की भलाई होती है और साथ-ही-साथ सेवा करनेवाले को आंतरिक संतोष भी होता है। उपयोगी सेवा के लिए शिक्षा आवश्यक है। अशिक्षित व्यक्ति थोड़े ही व्यक्तियों की सेवा कर सकता है, परन्तु एक शिक्षित व्यक्ति अपने विचारों एवं आविष्कारों से सारे देश की सेवा कर सकता है। यह सत्य है कि जीवन की सबसे अधिक आवश्यक वस्तु रुपया है, परन्तु अपनी आवश्यकता की पूर्ति ही से काम नहीं चलेगा। अपनी आवश्यकता की पूर्ति तो जानवर भी कर लेते है। मनुष्य जानवर से अच्छा है, इसलिए उससे कुछ अच्छी चीज की आशा की जाती है। अतः, मेरे जीवन का उद्देश्य ज्ञान प्राप्त करना और समाज की भलाई के लिए इसका उपयोग करना है।

मैं आशा करता हूँ कि तुम मेरे विचार को पसंद करोगे।

तुम्हारा शुभचिंतक,
रमन
पता- श्री अशोक कुमार
त्रिपोलिया,
पटना-7

अपने मित्र को एक पत्र लिखिए जिसमें एक वनभोज का वर्णन कीजिए जिसमें आपने भाग लिया हो।

पुनपुन,
15 जनवरी, 1988

प्रिय रमेश,

तुम्हारा पत्र पाकर मैं बहुत खुश हूँ। तुमने उस वनभोज के संबंध में कुछ लिखने का अनुरोध किया है जिसमें कुछ दिन पूर्व मैंने हाथ बंटाया था।

पिछली बार बड़े दिन की छुट्टी में मेरे कुछ मित्रों ने एक वनभोज का प्रबंध किया। यह तय किया गया कि बराबर पहाड़ी जाना चाहिए। 25 दिसंबर को लगभग नौ बजे सुबह हमलोगों ने बेला के लिए प्रस्थान किया। जाड़े का मौसम था। सूर्य तेजी से चमक रहा था। सूर्य की धूप में टहलना बड़ा आनंददायक था। दो मील की दूरी हमलोगों ने पैदल तय की और पहाड़ी के किनारे पहुँचे। पहाड़ी के तल के निकट पातालगंगा नाम की एक धारा है।

यहाँ से हमलोगों ने थोड़ा पानी अपने साथ ले लिया। ऊपर चढ़ने में लगभग एक घँटा समय लगा। हमलोगों को कुछ समय गुफाओं को देखने में लगा। गुफाएँ बहुत पुरानी है। इनकी दीवालें बहुत चमकदार है, मानों उनपर पालिश कर दी गई हो। उनमें से एक से मांस की दुर्गन्ध आ रही थी। कोई जंगली जानवर वहाँ आया होगा। पहाड़ी के बीच में एक बहुत सुंदर स्थान है। यह एक बहुत बड़ा खुला हुआ स्थान है, जिसके चरों ओर पहाड़ियाँ है।

यह आँगन की तरह दिखलाई पड़ता है। हमलोगों ने वहीं डेरा डाल दिया। हमलोग भोजन बनाने का प्रबंध करने लगे। लगभग दो घण्टे में भोजन तैयार हो गया। काफी मेहनत हो चुकी थी, इसलिए हमलोगों को जोरों की भूख लगी थी। यहाँ तक कि भोजन परोसे जाने के पहले ही हमलोग भूखे भेड़िए की तरह उसपर टूट पड़े। भोजन बड़ा स्वादिष्ट था। शायद ऐसा थकान और भूख के कारण हुआ। भोजन समाप्त करने के बाद हमलोग कहानी कहने के लिए बैठे।

हमलोगों में से प्रत्येक ने एक छोटी हास्यपूर्ण कहानी कही। हमलोग इच्छा-भर हँसे। उस समय चार बज गए थे। हमलोगों को पौने छह बजे गाड़ी पकड़नी थी। इसलिए हमलोगों ने प्रस्थान किया और आधा घण्टा पहले बेला स्टेशन पहुँच गए। गाड़ी ठीक समय पर आई। वनभोज का पूरा आनंद उठाकर हमलोग आठ बजे रात में घर पहुँच गए।

तुम्हारा शुभचिंतक,
मनोहर
पता- श्री रमेश तिवारी,
वर्ग 10,
जिला स्कूल,
मुंगेर

निर्धन-छात्र-कोष से सहायता के लिए अपने स्कूल के प्रधानाध्यापक के पास एक आवेदनपत्र लिखिए।

सेवा में,
प्रधानाध्यापक,
मुस्लिम एच० ई० स्कूल,
लहेरियासराय।
द्वारा: वर्गाध्यापक महोदय

महाशय,

सविनय निवेदन है कि मैं आपके स्कूल के दसवें वर्ग का एक गरीब विद्यार्थी हूँ। मेरे पिताजी मेरी शिक्षा का व्यय नहीं जुटा सकते। इसी कारण यहाँ मेरी पूरी फीस माफ है।

मैं पुस्तकें भी नहीं खरीद सकता हूँ। अतः, आपसे अनुरोध करता हूँ कि दीन-छात्र-कोष से मुझे पंद्रह रुपए का अनुदान पुस्तक खरीदने के लिए दिया जाए। इस दयापूर्ण कार्य के लिए मैं हमेशा आपका कृतज्ञ रहूँगा।

आपका आज्ञाकारी शिष्य,
शेख रजा हुसेन,
वर्ग 10,
क्रमांक- 12
15 फरवरी, 1998

एक पद के लिए आवेदन-पत्र

सेवा में,
जिलाधीश,
पटना।
द्वारा: उचित माध्यम

महाशय,

यह जानकर कि आपके अधीन रेकार्ड-कीपर का एक पद रिक्त हुआ है, मैं इसके लिए अपने को एक उम्मीदवार के रूप में प्रस्तुत करता हूँ।

अपनी योग्यता के संबंध में मुझे यह कहना है कि मैंने पिछले साल, मैट्रिक की परीक्षा द्वितीय श्रेणी में पास की है। अँगरेजी के अलावा मैं हिंदी और उर्दू भी अच्छी तरह से जानता हूँ और दोनों लिपियाँ तेजी से लिख सकता हूँ।

अभी मैं बिहार काँटेज इंडस्ट्रीज इंस्ट्रीच्यूट में 'स्टोर-कीपर' हूँ और पिछले दस महीने से अपने उच्च पदाधिकारियों को अपने कार्यो से पूर्ण संतोष प्रदान करता रहा हूँ जो मेरे आवेदन-पत्र पर अधीक्षक द्वारा दिए गए सिफारिश से स्पष्ट हो जाएगा। मेरी वर्तमान उम्र 23 वर्ष और कुछ महीने है।

अतः, आपसे अनुरोध करता हूँ कि कृपया उस पद पर मुझे नियुक्त कर लिया जाए। मैं इसके योग्य अपने को प्रमाणित करने की चेष्टा करूँगा।

मैं इस आवेदन-पत्र के साथ सेकेंडरी स्कूल प्रमाणपत्र एवं प्रधानाध्यापक तथा अन्य सहायक शिक्षकों के द्वारा दिए गए तीन प्रशंसापत्र भेज रहा हूँ।

विश्र्चासभाजन,
रामकुमार वर्मा,
स्टोर-कीपर
बिहार काँटेज इंडस्ट्रीज इंस्ट्रीच्यूट,
गुलजारबाग, पटना
20 जनवरी, 1998

विवाह के लिए निमंत्रण

अधोहस्ताक्षरी अपने पुत्र के विवाह के अवसर पर श्री बदरीनारायण सिन्हा की उपस्थिति का अनुरोध करते हैं। विवाह 20 फरवरी, 1988 को संध्या साढ़े आठ बजे होगा।

महेश चन्द्र दास
कार्यक्रम:
बारात- साढ़े पाँच बजे संध्या
भोजन- साढ़े सात बजे रात्रि
विवाह- साढ़े आठ बजे रात्रि
पर्ण कुटी, गया

भोजन के लिए निमंत्रण

श्री आर० एल० सामंत बुधवार दिनांक 11 फरवरी, 1988 के आठ बजे रात्रि के समय भोज के अवसर पर श्री एस० के० बनर्जी की उपस्थिति का अनुरोध करते हैं।

फ्रेजर रोड,
पटना-1

निमंत्रण स्वीकार करने का उत्तर

श्री एस० के० बनर्जी बड़े हर्ष के साथ श्री आर० एल० सामंत द्वारा 11 फरवरी, 1988 के आठ बजे रात्रि के समय भोजन का निमंत्रण स्वीकार करते हैं।

एक्जीबीशन रोड
पटना-1
9 फरवरी, 1988

निमंत्रण अस्वीकार करने का उत्तर

श्री एस० के० बनर्जी को खेद है कि वे बुधवार, दिनांक 11 फरवरी, 1988 के आठ बजे रात्रि के समय के भोज का निमंत्रण दूसरी जगह व्यस्तता के कारण स्वीकार नहीं कर सकते।

एक्जीबीशन रोड,
पटना-1
9 फरवरी, 1988

एक पुस्तक-विक्रेता को कुछ किताबें भेजने के लिए एक पत्र लिखिए।

सेवा में,
व्यवस्थापक
भारती भवन
गोविन्द मित्र रोड,
पटना-4

प्रिय महाशय,

यदि आप कृपया वी० पी ० पी० द्वारा निम्नलिखित पुस्तकें यथाशीघ्र मेरे पास भेज दें तो मैं आपका बड़ा आभारी रहूँगा।

1. सेलेक्ट यंग एसेज एंड लेटर्स- 3 प्रतियाँ।
2. हाउ टु राइट करेक्ट इंगलिश - 3 प्रतियाँ।
3. हाउ टु ट्रांस्लेट इंटु इंगलिश- 3 प्रतियाँ।

आपका विश्र्चासी,
सुरेश प्रसाद
व्यवस्थापक,
भारती भवन,
गोविन्द मित्र रोड
पटना-4