Lokokti (proverbs) लोकोक्तियाँ


घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध= (निकट का गुणी व्यक्ति कम सम्मान पाता है, पर दूर का ज्यादा)
प्रयोग- जग्गू को लोग जगुआ कहकर पुकारते थे। घर त्यागकर सिद्ध पुरुष की संगति में रहकर उसने सिद्धि प्राप्त कर ली और उसका नाम हो गया- स्वामी जगदानन्द। गाँव लौटा, तो किसी ने उसके गुणों की ओर ध्यान नहीं दिया। ठीक ही कहा गया है: 'घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध।'

घड़ी में घर जले, नौ घड़ी भद्रा= (हानि के समय सुअवसर-कुअवसर पर ध्यान न देना)

घर पर फूस नहीं, नाम धनपत= (गुण कुछ नहीं, पर गुणी कहलाना)

घर का भेदी लंका ढाए= (आपस की फूट से हानि होती है।)

घर की मुर्गी दाल बराबर= (घर की वस्तु का कोई आदर नहीं करना)

घर में दिया जलाकर मसजिद में जलाना= (दूसरे को सुधारने के पहले अपने को सुधारना)

घी का लड्डू टेढ़ा भला = (लाभदायक वस्तु किसी तरह की क्यों न हो।)

ढाक के तीन पात= (एक-सी स्थिति में रहना)

चिराग तले अँधेरा= (अपनी बुराई नहीं दीखती)
प्रयोग- मेरे समधी सुरेशप्रसादजी तो तिलक-दहेज न लेने का उपदेश देते फिरते है; पर अपने बेटे के ब्याह में दहेज के लिए ठाने हुए हैं। उनके लिए यही कहावत लागू है कि 'चिराग तले अँधेरा।'

चोर की दाढ़ी में तिनका= (अपने आप से डरना)
प्रयोग- विद्यालय से गायब होने पर पिता जी को बुलाने की बात सुनते ही कमल का चेहरा फीका पड़ गया। उसकी स्थिति चोर की दाढ़ी में तिनके के समान हो गई।

चूहे घर में दण्ड पेलते हैं= (आभाव-ही-आभाव)

चमड़ी जाय, पर दमड़ी न जाय= (महा कंजूस)

चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरी रात= (सुख के कुछ दिनों के बाद दुख का आना)
प्रयोग- आज पैसा आने पर ज्यादा मत उछलो, क्या पता कब कैसे दिन देखने पड़ें ? सही बात है- चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरी रात।

चोर पर मोर= (एक दूसरे से ज्यादा धूर्त)
प्रयोग-मृदुल और करन दोनों को कम मत समझो। ये दोनों ही चोर पर मोर हैं।

जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ= (परिश्रम का फल अवश्य मिलता है)
प्रयोग- एक लड़का, जो बड़ा आलसी था, बार-बार फेल करता था और दूसरा, जो परिश्रमी था, पहली बार परीक्षा में उतीर्ण हो गया। जब आलसी ने उससे पूछा कि भाई, तुम कैसे एक ही बार में पास कर गये, तब उसने जवाब दिया कि 'जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ'।

जान बची तो लाखों पाये= जान बचने से बड़ा कोई लाभ नहीं है।

जैसी करनी वैसी भरनी= (कर्म के अनुसार फल मिलता है)
प्रयोग- राधा ने समय पर प्रोजेक्ट नहीं दिखाया और उसे उसमें शून्य अंक प्राप्त हुए। ठीक ही हुआ- जैसी करनी वैसी भरनी।

जिसकी लाठी उसकी भैंस= (बलवान की ही जीत होती है)
प्रयोग-सरपंच ने जिसे चाहा उसे बीज दिया। बेचारे किसान कुछ न कर पाए। इसे कहते हैं- जिसकी लाठी उसकी भैंस।

ठठेरे-ठठेरे बदलौअल= (चालाक को चालक से काम पड़ना)

ताड़ से गिरा तो खजूर पर अटका= (एक खतरे में से निकलकर दूसरे खतरे में पड़ना)

तीन कनौजिया, तेरह चूल्हा= (जितने आदमी उतने विचार)

तेली का तेल जले और मशालची का सिर दुखे (छाती फाटे)= (खर्च किसी का हो और बुरा किसी और को मालूम हो)

तन पर नहीं लत्ता पान खाय अलबत्ता= (शेखी बघारना)

तीन लोक से मथुरा न्यारी= (निराला ढंग)

तुम डाल-डाल तो हम पात-पात= (किसी की चाल को खूब समझते हुए चलना)

थोथा चना बाजे घना= कम जानकार में घमण्ड अधिक होता है।

थूक कर चाटना ठीक नहीं= (देकर लेना ठीक नहीं, वचन-भंग करना, अनुचित।)

दमड़ी की हाँड़ी गयी, कुत्ते की जात पहचानी गयी= (मामूली वस्तु में दूसरे की पहचान।)

दमड़ी की बुलबुल, नौ टका दलाली= ( काम साधारण, खर्च अधिक)

दाल-भात मेंमूसलचन्द= (बेकार दखल देना)

दुधारू गाय की दो लात भी भली= (जिससे लाभ होता हो, उसकी बातें भी सह लेनी चाहिए)

दूध का जला मट्ठा भी फूंक-फूंक कर पीता है= (एक बार धोखा खा जाने पर सावधान हो जाना)

दूर का ढोल सुहावना= (दूर से कोई चीज अच्छी लगती है।)

देशी मुर्गी, विलायती बोल= (बेमेल काम करना)

दूध का दूध पानी का पानी= सही निर्णय।

दूध का जला छाछ को फूंक मारकर पीता है= धोखा खाकर आदमी सतर्क हो जाता है।

दीवारों के भी कान होते हैं= गुप्त बात छिपी नहीं रहती।

धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का= (निकम्मा, व्यर्थ इधर-उधर डालनेवाला)

नाच न जाने आँगन टेढ़= (काम न जानना और बहाना बनाना)
प्रयोग- सुधा से गाने के लिए कहा, तो उसने कहा- साज ही ठीक नहीं, गाऊँ क्या ?कहा है: 'नाच न जाने आँगन टेढ़।'

न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी= (न कारण होगा, न कार्य होगा)
प्रयोग- सेठ माणिकचन्द के घर रोज लड़ाई-झगड़ा हुआ करता था। इस झगड़े की जड़ में था एक नौकर। वही इधर की बात उधर किया करता था। यह बात सेठ को मालूम हो गयी। उन्होंने उसे निकाल दिया। बहुतों ने उसकी ओर से सिफारिश की तो सेठ ने कहा- 'नहीं, वह झगड़ा लगाता है। 'न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।'

नक्कारखाने में तूती की आवाज= (सुनवाई न होना)

न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी= (न बड़ा प्रबंध होगा न काम होगा)

न देने के नौ बहाने= (न देने के बहुत-से बहाने)

नदी में रहकर मगर से वैर=(जिसके अधिकार में रहना, उसी से वैर करना)

नौ की लकड़ी, नब्बे खर्च= काम साधारण, खर्च अधिक)

नौ नगद, न तेरह उधार= (अधिक उधार की अपेक्षा थोड़ा लाभ अच्छा)

नीम हकीम खतरे जान= (अयोग्य से हानि)

नाम बड़े, पर दर्शन थोड़े= (गुण से अधिक बड़ाई)

नाच कूदे तोड़े तान, ताको दुनिया राखे मान= आडम्बर दिखानेवाला मान पाता है।)

पढ़े फारसी बेचे तेल देखो यह किस्मत (या कुदरत) का खेल= (भाग्यहीन होना)

पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं= (पराधीनता में सुख नहीं)

पहले भीतर तब देवता-पितर= (पेट-पूजा सबसे प्रधान)

पूछी न आछी, मैं दुलहिन की चाची= (जबरदस्ती किसी के सर पड़ना)

पराये धन पर लक्ष्मीनारायण= (दूसरे का धन पाकर अधिकार जमाना)

पानी पीकर जात पूछना= (कोई काम कर चुकने के बाद उसके औचित्य पर विचार करना)

पंच परमेश्वर= (पाँच पंचो की राय)

पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होतीं= सभी व्यक्ति एक-से नहीं होते।

परहित सरिस धरम नहिं भाई= (परोपकार से बढ़कर और कोई धर्म नहीं)
प्रयोग- हमें सदैव दूसरों की मदद करनी चाहिए, क्योंकि परहित सरिस धरम नहिं भाई।

बिल्ली के भाग्य से छींका टूटना= अचानक मनचाहा कार्य हो जाना।

बूड़ा वंश कबीर का उपजा पूत कमाल= (श्रेष्ठ वंश में बुरे का पैदा होना)

बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद= (मूर्ख गुण की कद्र करना नहीं जानता)
प्रयोग- रमेश खुद तो कला के बारे में कुछ जानता नहीं है, इसलिए जब भी उसे कला-संबंधी कोई चीज दिखाओ, तो हमेशा मीन-मेख निकालता है। सच ही कहा गया है- बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद।

बाँझ क्या जाने प्रसव की पीड़ा= (जिसको दुःख नहीं हुआ है वह दूसरे के दुःख को समझ नहीं सकता)

बहती गंगा में हाथ धोना= (अवसर का लाभ उठाना)
प्रयोग-सत्संग के लिए काफी लोग एकत्रित हुए थे। ऐसे में क्षेत्रीय नेता भी वहाँ आ गए और उन्होंने अपना लंबा-चौड़ा भाषण दे डाला। इसे कहते हैं- बहती गंगा में हाथ धोना।

बोये पेड़ बबूल के आम कहाँ से होय= (जैसी करनी, वैसी भरनी)

बैल का बैल गया नौ हाथ का पगहा भी गया= (बहुत बड़ा घाटा)

बकरे की माँ कब तक खैर मनायेगी= (भय की जगह पर कब तक रक्षा होगी)

बेकार से बेगार भली= (चुपचाप बैठे रहने की अपेक्षा कुछ काम करना)

बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ, छोटे मियाँ सुभान अल्लाह= (बड़ा तो जैसा है, छोटा उससे बढ़कर है)

भागते चोर की लंगोटी ही सही= (सारा जाता देखकर थोड़े में ही सन्तोष करना)
प्रयोग- सेठ करोड़ीमल पर मेरे दस हजार रुपये थे। दिवाला निकलने के कारण वह केवल दो हजार रु० ही दे रहा है। मैंने सोचा, चलो भागते चोर की लंगोटी ही सही।

भइ गति साँप-छछूँदर केरी= (दुविधा में पड़ना)

भैंस के आगे बीन बजाना= (मूर्ख को गुण सिखाना व्यर्थ है।)
प्रयोग-अरे ! रवि को पढ़ाई की बातें क्यों समझा रहे हो ? उसके लिए पढ़ाई-लिखाई सब बेकार की बातें हैं। तुम व्यर्थ ही भैंस के आगे बीन बजा रहे हो।

भागते भूत की लँगोटी ही सही= (जाते हुए माल में से जो मिल जाय वही बहुत है।)

मुँह में राम बगल में छुरी= (बाहर से मित्रता पर भीतर से बैर)
प्रयोग- सुरभि और प्रतिभा दोनों आपस में अच्छी सहेलियाँ बनती हैं, परंतु मौका पाते ही एक-दूसरे की बुराई करना शुरू कर देती हैं। यह तो वही बात हुई- मुँह में राम बगल में छुरी।

मियाँ की दौड़ मस्जिद तक= (किसी के कार्यक्षेत्र या विचार शक्ति का सिमित होना)

मन चंगा तो कठौती में गंगा= (हृदय पवित्र तो सब कुछ ठीक)

मान न मान मैं तेरा मेहामन= (जबरदस्ती किसी के गले पड़ना)

मेढक को भी जुकाम= (ओछे का इतराना)

मार-मार कर हकीम बनाना= (जबरदस्ती आगे बढ़ाना)

माले मुफ्त दिले बेरहम= (मुफ्त मिले पैसे को खर्च करने में ममता न होना)

मियाँ-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी= (जब दो व्यक्ति परस्पर किसी बात पर राजी हो तो दूसरे को इसमें क्या)

मोहरों की लूट, कोयले पर छाप= (मूल्यवान वस्तुओं को छोड़कर तुच्छ वस्तुओं पर ध्यान देना)

मानो तो देव, नहीं तो पत्थर= (विश्वास ही फलदायक)

मँगनी के बैल के दाँत नहीं देखे जाते= (मुप्त मिली चीज पर तर्क व्यर्थ)

रस्सी जल गयी पर ऐंठन न गयी= (बुरी हालत में पड़कर भी अभियान न त्यागना)
प्रयोग- लड़की घर से भाग गई, बेटा स्कूल से निकाल दिया गया, लेकिन मिसेज बक्शी के तेवर अभी भी नहीं बदले। यह तो वही बात हुई- रस्सी जल गयी पर ऐंठन न गयी।

रोग का घर खाँसी, झगड़े घर हाँसी= (अधिक मजाक बुरा)

लश्कर में ऊँट बदनाम= (दोष किसी का, बदनामी किसी की)

लूट में चरखा नफा= (मुफ्त में जो हाथ लगे, वही अच्छा)

लेना-देना साढ़े बाईस= (सिर्फ मोल-तोल करना)

साँच को आँच नहीं-(जो मनुष्य सच्चा होता है, उसे डर नहीं होता)=
प्रयोग-मुकेश, जब तुमने गलती की ही नहीं है, तो फिर डर क्यों रहे हो ? चलो सब कुछ सच-सच बता दो, क्योंकि साँच को आँच नहीं होती।

साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे= ()आसानी से काम हो जाना)
प्रयोग-ठेकेदार और जमींदार के झगड़े में पंच को ऐसा फैसला सुनाना चाहिए कि साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।

सब धन बाईस पसेरी= (अच्छे-बुरे सबको एक समझना)

सत्तर चूहे खाके बिल्ली चली हज को= (जन्म भर बुरा करके अन्त में धर्मात्मा बनना)

सीधी ऊँगली से घी नहीं निकलता= (सिधाई से काम नहीं होता)

सारी रामायण सुन गये, सीता किसकी जोय (जोरू)= (सारी बात सुन जाने पर साधारण सी बात का भी ज्ञान न होना)

सौ सुनार की एक लुहार की= (शक्तिशाली की एक और निर्बल की सौ चोट बराबर)

होनहार बिरवान के होत चीकने पात= (होनहार के लक्षण पहले से ही दिखायी पड़ने लगते है।)
प्रयोग- वह लड़का जैसा सुन्दर है, वैसा ही सुशील, और जैसा बुद्धिमान है, वैसा ही चंचल। अभी बारह वर्ष भी पूरे नहीं हुए, पर भाषा और गणित में उसकी अच्छी पैठ है। अभी देखने पर स्पष्ट मालूम होता है कि समय पर वह सुप्रसिद्ध विद्वान होगा। कहावत भी है, 'होनहार बिरवान के होत चीकने पात'।

हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और= (कहना कुछ और करना कुछ और)
प्रयोग- आजकल के नेताओं का विश्वास नहीं। इनके दाँत तो दिखाने के और होते हैं और खाने के और होते हैं।

हाथ कंगन को आरसी क्या= (प्रत्यक्ष के लिए प्रमाण क्या)

हाथी चले बाजार, कुत्ता भूँके हजार= (उचित कार्य करने में दूसरों की निन्दा की परवाह नहीं करनी चाहिए)

हाथी के दाँत दिखाने के और, खाने के और= (बोलना कुछ, करना कुछ और)

हँसुए के ब्याह में खुरपे का गीत= (बेमौका)

हंसा थे सो उड़ गये, कागा भये दीवान= (नीच का सम्मान)