Lokokti (proverbs) लोकोक्तियाँ


लोकोक्तियाँ (proverbs) की परिभाषा

किसी विशेष स्थान पर प्रसिद्ध हो जाने वाले कथन को 'लोकोक्ति' कहते हैं।
दूसरे शब्दों में- जब कोई पूरा कथन किसी प्रसंग विशेष में उद्धत किया जाता है तो लोकोक्ति कहलाता है। इसी को कहावत कहते है।

उदाहरण- 'उस दिन बात-ही-बात में राम ने कहा, हाँ, मैं अकेला ही कुँआ खोद लूँगा। इन पर सबों ने हँसकर कहा, व्यर्थ बकबक करते हो, अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता' । यहाँ 'अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता' लोकोक्ति का प्रयोग किया गया है, जिसका अर्थ है 'एक व्यक्ति के करने से कोई कठिन काम पूरा नहीं होता' ।

लोकोक्ति किसी घटना पर आधारित होती है। इसके प्रयोग में कोई परिवर्तन नहीं होता है। ये भाषा के सौन्दर्य में वृद्धि करती है। लोकोक्ति के पीछे कोई कहानी या घटना होती है। उससे निकली बात बाद में लोगों की जुबान पर जब चल निकलती है, तब 'लोकोक्ति' हो जाती है।

मुहावरा और लोकोक्ति में अंतर

दोनों में अंतर इस प्रकार है-
(1) मुहावरा वाक्यांश होता है, जबकि लोकोक्ति एक पूरा वाक्य, दूसरे शब्दों में, मुहावरों में उद्देश्य और विधेय नहीं होता, जबकि लोकोक्ति में उद्देश्य और विधेय होता है।
(2) मुहावरा वाक्य का अंश होता है, इसलिए उनका स्वतंत्र प्रयोग संभव नहीं है; उनका प्रयोग वाक्यों के अंतर्गत ही संभव है। लोकोक्ति एक पूरे वाक्य के रूप में होती है, इसलिए उनका स्वतंत्र प्रयोग संभव है।
(3) मुहावरे शब्दों के लाक्षणिक या व्यंजनात्मक प्रयोग हैं जबकि लोकोक्तियाँ वाक्यों के लाक्षणिक या व्यंजनात्मक प्रयोग हैं।

यहाँ कुछ लोकोक्तियाँ व उनके अर्थ तथा प्रयोग दिये जा रहे हैं-

अन्धों में काना राजा= (मूर्खो में कुछ पढ़ा-लिखा व्यक्ति)
प्रयोग- मेरे गाँव में कोई पढ़ा-लिखा व्यक्ति तो है नही; इसलिए गाँववाले पण्डित अनोखेराम को ही सब कुछ समझते हैं। ठीक ही कहा गया है, अन्धों में काना राजा।

अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता= (अकेला आदमी लाचार होता है।)
प्रयोग- माना कि तुम बलवान ही नहीं, बहादुर भी हो, पर अकेले डकैतों का सामना नहीं कर सकते। तुमने सुना ही होगा कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता।

अधजल गगरी छलकत जाय= डींग हाँकना।
प्रयोग- इसके दो-चार लेख क्या छप गये कि वह अपने को साहित्य-सिरमौर समझने लगा है। ठीक ही कहा गया है, 'अधजल गगरी छलकत जाय।'

आँख का अन्धा नाम नयनसुख= (गुण के विरुद्ध नाम होना।)
प्रयोग- एक मियाँजी का नाम था शेरमार खाँ। वे अपने दोस्तों से गप मार रहे थे। इतने में घर के भीतर बिल्लियाँ म्याऊँ-म्याऊँ करती हुई लड़ पड़ी। सुनते ही शेरमार खाँ थर-थर काँपने लगे। यह देख एक दोस्त ठठाकर हँस पड़ा और बोला कि वाह जी शेरमार खाँ, आपके लिए तो यह कहावत बहुत ठीक है कि आँख का अन्धा नाम नयनमुख।

आँख के अन्धे गाँठ के पूरे= (मूर्ख धनवान)
प्रयोग- वकीलों की आमदनी के क्या कहने। उन्हें आँख के अन्धे गाँठ के पूरे रोज ही मिल जाते हैं।

आग लगन्ते झोपड़ा, जो निकले सो लाभ= नुकसान होते-होते जो कुछ बच जाय, वही बहुत है।
प्रयोग- किसी के घर चोरी हुई। चोर नकद और जेवर कुल उठा ले गये। बरतनों पर जब हाथ साफ करने लगे, तब उनकी झनझनाहट सुनकर घर के लोग जाग उठे। देखा तो कीमती माल सब गायब। घर के मालिकों ने बरतनों पर आँखें डालकर अफसोस करते हुए कहा कि खैर हुई, जो ये बरतन बच गये। आग लगन्ते झोपड़ा, जो निकले सो लाभ। यदि ये भी चले गये होते, तो कल पत्तों पर ही खाना पड़ता।

आगे नाथ न पीछे पगहा= (किसी तरह की जिम्मेवारी का न होना)
प्रयोग- अरे, तुम चक्कर न मारोगे तो और कौन मारेगा? आगे नाथ न पीछे पगहा। बस, मौज किये जाओ।

आम के आम गुठलियों के दाम= (अधिक लाभ)
प्रयोग- सब प्रकार की पुस्तकें 'साहित्य भवन' से खरीदें और पास होने पर आधे दामों पर बेचें। 'आम के आम गुठलियों के दाम' इसी को कहते हैं।

ओखली में सिर दिया, तो मूसलों से क्या डर= (काम करने पर उतारू होना)
प्रयोग- जब मैनें देशसेवा का व्रत ले लिया, तब जेल जाने से क्यों डरें? जब ओखली में सिर दिया, तब मूसलों से क्या डर।

आ बैल मुझे मार= (स्वयं मुसीबत मोल लेना)
प्रयोग- लोग तुम्हारी जान के पीछे पड़े हुए हैं और तुम आधी-आधी रात तक अकेले बाहर घूमते रहते हो। यह तो वही बात हुई- आ बैल मुझे मार।

आँखों के अन्धे नाम नयनसुख= (गुण के विरुद्ध नाम होना)
प्रयोग- उसका नाम तो करोड़ीमल है परन्तु वह पैसे-पैसे के लिए मारा-मारा फिरता है। इसे कहते है- आँखों के अन्धे नाम नयनसुख।

अन्धा बाँटे रेवड़ी फिर-फिर अपने को दे= (अधिकार का नाजायज लाभ अपनों को देना)

अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है= अपने स्थान पर निर्बल भी स्वयं को सबल समझता है।

अन्धा क्या चाहे दो आँख= अपनी मनपसन्द वस्तु को पा लेना।

अशर्फी की लूट और कोयले पर छाप= (मूल्यवान वस्तुओं को नष्ट करना और तुच्छ को सँजोना)

अंधों के आगे रोना, अपना दीदा खोना= (निर्दयी या मूर्ख के आगे दुःखड़ा रोना बेकार होता है।)

अपनी करनी पार उतरनी= (किये का फल भोगना)

अपना ढेंढर न देखे और दूसरे की फूली निहारे= (अपना दोष न देखकर दूसरों का दोष देखना)

अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग=(परस्पर संगठन या मेल न रखना)

आप डूबे जग डूबा= (जो स्वयं बुरा होता है, दूसरों को भी बुरा समझता है।)

आग लगाकर जमालो दूर खड़ी= (झगड़ा लगाकर अलग हो जाना)

आगे कुआँ, पीछे पगहा= (अपना कोई न होना, घर का अकेला होना)

आँख का अंधा नाम नयनमुख= (गुण के विरुद्ध नाम)

आधा तीतर आधा बटेर= (बेमेल स्थिति)

आप भला तो जग भला= (स्वयं अच्छे तो संसार अच्छा)

आये थे हरि-भजन को ओटन लगे कपास= (करने को तो कुछ आये और करने लगे कुछ और)

ओछे की प्रीत बालू की भीत=(नीचों का प्रेम क्षणिक)

ओस चाटने से प्यास नहीं बूझती= (अधिक कंजूसी से काम नहीं चलता)

ऊँची दूकान फीके पकवान=(केवल ब्राह्य प्रदर्शन)
प्रयोग- जग्गू तेली शुद्ध सरसों तेल का विज्ञापन करता है, लेकिन उसकी दूकान पर बिकता है रेपसीड-मिला सरसों तेल। ठीक है ऊँची दूकान फीके पकवान।

उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे= (अपराधी ही पकड़नेवाले को डाँट बताये)

उद्योगिन्न पुरुषसिंहनुपैति लक्ष्मी= (उद्योगी को ही धन मिलता है।)

ऊपर-ऊपर बाबाजी, भीतर दगाबाजी= (बाहर से अच्छा, भीतर से बुरा)

ऊँचे चढ़ के देखा, तो घर-घर एकै लेखा= (सभी एक समान)

ऊँट किस करवट बैठता है= (किसकी जीत होती है।)

ऊँट के मुँह में जीरा= (जरूरत से बहुत कम)

ऊँट बहे और गदहा पूछे कितना पानी= (जहाँ बड़ों का ठिकाना नहीं, वहाँ छोटों का क्या कहना)

ऊधो का लेना न माधो का देना=(लटपट से अलग रहना)

ईश्वर की माया कहीं धूप कहीं छाया= (ईश्वर की बातें विचित्र हैं।)
प्रयोग- कई बेचारे फुटपाथ पर ही रातें गुजारते हैं और कई भव्य बंगलों में आनन्द करते हैं। सच है ईश्वर की माया कहीं धूप कहीं छाया।

इतनी-सी जान, गज भर की जबान= (छोटा होना पर बढ़-बढ़कर बोलना)

ईंट का जवाब पत्थर= (दुष्ट के साथ दुष्टता करना)

इस हाथ दे, उस हाथ ले= (कर्मो का फल शीघ्र पाना)

ईश्वर की माया, कहीं धूप कहीं छाया= (कहीं सुख, कहीं दुःख)

एक पन्थ दो काज= (एक काम से दूसरा काम हो जाना)
प्रयोग- दिल्ली जाने से एक पन्थ दो काज होंगे। कवि-सम्मेलन में कविता-पाठ भी करेंगे और साथ ही वहाँ की ऐतिहासिक इमारतों को भी देखेंगे।

एक और एक ग्यारह= एकता में शक्ति होती है।

एक हाथ से ताली नहीं बजती= झगड़ा एक ओर से नहीं होता।

एक तो करेला आप तीता दूजे नीम चढ़ा= (बुरे का और बुरे से संग होना)

एक अनार सौ बीमार= (एक वस्तु को सभी चाहनेवाले)

एक तो चोरी दूसरे सीनाज़ोरी= (दोष करके न मानना)

एक म्यान में दो तलवार= (एक स्थान पर दो उग्र विचार वाले)

कहाँ राजा भोज कहाँ गाँगू तेली= (उच्च और साधारण की तुलना कैसी)
प्रयोग- तुम सेठ करोड़ीमल के बेटे हो। मैं एक मजदूर का बेटा। तुम्हारा हमारा और मेरा मेल कैसा ? कहाँ राजा भोज कहाँ गाँगू तेली।

कंगाली में आटा गीला= परेशानी पर परेशानी आना।

कबीरदास की उलटी बानी, बरसे कंबल भींगे पानी= (प्रकृतीविरुद्ध काम)

कहे खेत की, सुने खलिहान की= (हुक्म कुछ और करना कुछ और)

कहीं का ईट कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा= (इधर-उधर से सामान जुटाकर काम करना)

काला अक्षर भैंस बराबर=(निरा अनपढ़)

काबुल में क्या गदहे नहीं होते= (अच्छे बुरे सभी जगह हैं।)

का वर्षा जब कृषि सुखाने= (मौका बीत जाने पर कार्य करना व्यर्थ है।)

काठ की हाँड़ी दूसरी बार नहीं चढ़ती= (कपट का फल अच्छा नहीं होता)

किसी का घर जले, कोई तापे= (दूसरे का दुःख में देखकर अपने को सुखी मानना)

खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है= एक का प्रभाव दूसरे पर अवश्य पड़ता है।

खरी मजूरी चोखा काम= (अच्छे मुआवजे में ही अच्छा फल प्राप्त होना)

खोदा पहाड़ निकली चुहिया= (कठिन परिश्रम, थोड़ा लाभ)

खेत खाये गदहा, मार खाये जोलहा= (अपराध करे कोई, दण्ड मिले किसी और को)

गाँव का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध= (बाहर के व्यक्तियों का सम्मान, पर अपने यहाँ के व्यक्तियों की कद्र नहीं)

गुड़ खाय गुलगुले से परहेज= (बनावटी परहेज)

गोद में छोरा नगर में ढिंढोरा= (पास की वस्तु का दूर जाकर ढूँढना)

गाछे कटहल, ओठे तेल= (काम होने के पहले ही फल पाने की इच्छा)

गरजेसो बरसे नहीं= (बकवादी कुछ नहीं करता)

गुड़ गुड़, चेला चीनी= (गुरु से शिष्य का ज्यादा काबिल हो जाना)