Vakya vichar(Syntax)(वाक्य विचार)


वाक्य का रूपान्तर

किसी वाक्य को दूसरे प्रकार के वाक्य में, बिना अर्थ बदले, परिवर्तित करने की प्रकिया को 'वाक्यपरिवर्तन' कहते हैं। हम किसी भी वाक्य को भित्र-भित्र वाक्य-प्रकारों में परिवर्तित कर सकते है और उनके मूल अर्थ में तनिक विकार नहीं आयेगा। हम चाहें तो एक सरल वाक्य को मिश्र या संयुक्त वाक्य में बदल सकते हैं।

सरल वाक्य- हर तरह के संकटो से घिरा रहने पर भी वह निराश नहीं हुआ।
संयुक्त वाक्य- संकटों ने उसे हर तरह से घेरा, किन्तु वह निराश नहीं हुआ।
मिश्र वाक्य- यद्यपि वह हर तरह के संकटों से घिरा था, तथापि निराश नहीं हुआ।

वाक्यपरिवर्तन करते समय एक बात खास तौर से ध्यान में रखनी चाहिए कि वाक्य का मूल अर्थ किसी भी हालत में विकृत न हो। यहाँ कुछ और उदाहरण देकर विषय को स्पष्ट किया जाता है-

(क) सरल वाक्य से मिश्र वाक्य

सरल वाक्य- उसने अपने मित्र का पुस्तकालय खरीदा।
मिश्र वाक्य- उसने उस पुस्तकालय को खरीदा, जो उसके मित्र का था।
सरल वाक्य- अच्छे लड़के परिश्रमी होते हैं।
मिश्र वाक्य- जो लड़के अच्छे होते है, वे परिश्रमी होते हैं।
सरल वाक्य- लोकप्रिय कवि का सम्मान सभी करते हैं।
मिश्र वाक्य- जो कवि लोकप्रिय होता है, उसका सम्मान सभी करते हैं।

(ख) सरल वाक्य से संयुक्त वाक्य

सरल वाक्य- अस्वस्थ रहने के कारण वह परीक्षा में सफल न हो सका।
संयुक्त वाक्य- वह अस्वस्थ था और इसलिए परीक्षा में सफल न हो सका।
सरल वाक्य- सूर्योदय होने पर कुहासा जाता रहा।
संयुक्त वाक्य- सूर्योदय हुआ और कुहासा जाता रहा।
सरल वाक्य- गरीब को लूटने के अतिरिक्त उसने उसकी हत्या भी कर दी।
संयुक्त वाक्य- उसने न केवल गरीब को लूटा, बल्कि उसकी हत्या भी कर दी।

(ग) मिश्र वाक्य से सरल वाक्य

मिश्र वाक्य- उसने कहा कि मैं निर्दोष हूँ।
सरल वाक्य- उसने अपने को निर्दोष घोषित किया।
मिश्र वाक्य- मुझे बताओ कि तुम्हारा जन्म कब और कहाँ हुआ था।
सरल वाक्य- तुम मुझे अपने जन्म का समय और स्थान बताओ।
मिश्र वाक्य- जो छात्र परिश्रम करेंगे, उन्हें सफलता अवश्य मिलेगी।
सरल वाक्य- परिश्रमी छात्र अवश्य सफल होंगे।

(घ) कर्तृवाचक से कर्मवाचक वाक्य

कर्तृवाचक वाक्य- लड़का रोटी खाता है।
कर्मवाचक वाक्य- लड़के से रोटी खाई जाती है।
कर्तृवाचक वाक्य- तुम व्याकरण पढ़ाते हो।
कर्मवाचक वाक्य- तुमसे व्याकरण पढ़ाया जाता है।
कर्तृवाचक वाक्य- मोहन गीत गाता है।
कर्मवाचक वाक्य- मोहन से गीत गाया जाता है।

(ड़) विधिवाचक से निषेधवाचक वाक्य

विधिवाचक वाक्य- वह मुझसे बड़ा है।
निषेधवाचक- मैं उससे बड़ा नहीं हूँ।
विधिवाचक वाक्य- अपने देश के लिए हरएक भारतीय अपनी जान देगा।
निषेधवाचक वाक्य- अपने देश के लिए कौन भारतीय अपनी जान न देगा ?

सामान्य वाक्य: अशुद्धियाँ एवं उनके संशोधन

वाक्य रचना के कुछ सामान्य नियम

वाक्य को सुव्यवस्थित और संयत रूप देने को व्याकरण में 'पदक्रम' कहते हैं। निर्दोष वाक्य लिखने के कुछ नियम हैं। इनकी सहायता से शुद्ध वाक्य लिखने का प्रयास किया जा सकता है।
सुन्दर वाक्यों की रचना के लिए (क) क्रम (order), (ख) अन्वय (co-ordination) और (ग) प्रयोग (use) से सम्बद्ध कुछ सामान्य नियमों का ज्ञान आवश्यक है।

(क) क्रम

किसी वाक्य के सार्थक शब्दों को यथास्थान रखने की क्रिया को 'क्रम' अथवा 'पदक्रम' कहते हैं। इसके कुछ सामान्य नियम इस प्रकार हैं-

(i) हिंदी वाक्य के आरम्भ में कर्ता, मध्य में कर्म और अन्त में क्रिया होनी चाहिए। जैसे- मोहन ने भोजन किया।
यहाँ कर्ता 'मोहन', कर्म 'भोजन' और अन्त में क्रिया 'क्रिया' है।

(ii) उद्देश्य या कर्ता के विस्तार को कर्ता के पहले और विधेय या क्रिया के विस्तार को विधेय के पहले रखना चाहिए। जैसे-अच्छे लड़के धीरे-धीरे पढ़ते हैं।

(iii) कर्ता और कर्म के बीच अधिकरण, अपादान, सम्प्रदान और करण कारक क्रमशः आते हैं। जैसे-
मुरारि ने घर में (अधिकरण) आलमारी से (अपादान) श्याम के लिए (सम्प्रदान) हाथ से (करण) पुस्तक निकाली।

(iv) सम्बोधन आरम्भ में आता है। जैसे-
हे प्रभु, मुझपर दया करें।

(v) विशेषण विशेष्य या संज्ञा के पहले आता है। जैसे-
मेरी उजली कमीज कहीं खो गयी।

(vi) क्रियाविशेषण क्रिया के पहले आता है। जैसे-
वह तेज दौड़ता है।

(vii) प्रश्रवाचक पद या शब्द उसी संज्ञा के पहले रखा जाता है, जिसके बारे में कुछ पूछा जाय। जैसे-
क्या मोहन सो रहा है ?

टिप्पणी- यदि संस्कृत की तरह हिंदी में वाक्यरचना के साधारण क्रम का पालन न किया जाय, तो इससे कोई क्षति अथवा अशुद्धि नहीं होती। फिर भी, उसमें विचारों का एक तार्किक क्रम ऐसा होता है, जो एक विशेष रीति के अनुसार एक-दूसरे के पीछे आता है।

(ख) अन्वय (मेल)

'अन्वय' में लिंग, वचन, पुरुष और काल के अनुसार वाक्य के विभित्र पदों (शब्दों) का एक-दूसरे से सम्बन्ध या मेल दिखाया जाता है। यह मेल कर्ता और क्रिया का, कर्म और क्रिया का तथा संज्ञा और सर्वनाम का होता हैं।

कर्ता और क्रिया का मेल

(i) यदि कर्तृवाचक वाक्य में कर्ता विभक्तिरहित है, तो उसकी क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष कर्ता के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार होंगे। जैसे-
करीम किताब पढ़ता है। सोहन मिठाई खाता है। रीता घर जाती है।

(ii) यदि वाक्य में एक ही लिंग, वचन और पुरुष के अनेक विभक्तिरहित कर्ता हों और अन्तिम कर्ता के पहले 'और' संयोजक आया हो, तो इन कर्ताओं की क्रिया उसी लिंग के बहुवचन में होगी जैसे-
मोहन और सोहन सोते हैं। आशा, उषा और पूर्णिमा स्कूल जाती हैं।

(iii) यदि वाक्य में दो भित्र लिंगों के कर्ता हों और दोनों द्वन्द्वसमास के अनुसार प्रयुक्त हों तो उनकी क्रिया पुंलिंग बहुवचन में होगी। जैसे-
नर-नारी गये। राजा-रानी आये। स्त्री-पुरुष मिले। माता-पिता बैठे हैं।

(iv) यदि वाक्य में दो भित्र-भित्र विभक्तिरहित एकवचन कर्ता हों और दोनों के बीच 'और' संयोजक आये, तो उनकी क्रिया पुंलिंग और बहुवचन में होगी। जैसे-
राधा और कृष्ण रास रचते हैं। बाघ और बकरी एक घाट पानी पीते हैं।

(v) यदि वाक्य में दोनों लिंगों और वचनों के अनेक कर्ता हों, तो क्रिया बहुवचन में होगी और उनका लिंग अन्तिम कर्ता के अनुसार होगा। जैसे-
एक लड़का, दो बूढ़े और अनेक लड़कियाँ आती हैं। एक बकरी, दो गायें और बहुत-से बैल मैदान में चरते हैं।

(vi) यदि वाक्य में अनेक कर्ताओं के बीच विभाजक समुच्चयबोधक अव्यय 'या' अथवा 'वा' रहे तो क्रिया अन्तिम कर्ता के लिंग और वचन के अनुसार होगी। जैसे-
घनश्याम की पाँच दरियाँ वा एक कम्बल बिकेगा। हरि का एक कम्बल या पाँच दरियाँ बिकेंगी। मोहन का बैल या सोहन की गायें बिकेंगी।

(vii) यदि उत्तमपुरुष, मध्यमपुरुष और अन्यपुरुष एक वाक्य में कर्ता बनकर आयें तो क्रिया उत्तमपुरुष के अनुसार होगी। जैसे-
वह और हम जायेंगे। हरि, तुम और हम सिनेमा देखने चलेंगे। वह, आप और मैं चलूँगा।
गुरूजी का मत है कि वाक्य में पहले मध्यमपुरुष प्रयुक्त होता है, उसके बाद अन्यपुरुष और अन्त में उत्तमपुरुष; जैसे- तुम, वह और मैं जाऊँगा।