Visheshan(Adjective)(विशेषण)


विशेष्य और विशेषण में सम्बन्ध

विशेषण संज्ञा अथवा सर्वनाम की विशेषता बताता है और जिस संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बतायी जाती है, उसे विशेष्य कहते हैं।
वाक्य में विशेषण का प्रयोग दो प्रकार से होता है- कभी विशेषण विशेष्य के पहले आता है और कभी विशेष्य के बाद।

प्रयोग की दृष्टि से विशेषण के दो भेद है-
(1) विशेष्य-विशेषण (2) विधेय-विशेषण

(1) विशेष्य-विशेष- जो विशेषण विशेष्य के पहले आये, वह विशेष्य-विशेष होता है-
जैसे- रमेश 'चंचल' बालक है। सुनीता 'सुशील' लड़की है।
इन वाक्यों में 'चंचल' और 'सुशील' क्रमशः बालक और लड़की के विशेषण हैं, जो संज्ञाओं (विशेष्य) के पहले आये हैं।

(2) विधेय-विशेषण- जो विशेषण विशेष्य और क्रिया के बीच आये, वहाँ विधेय-विशेषण होता है;
जैसे- मेरा कुत्ता 'काला' हैं। मेरा लड़का 'आलसी' है। इन वाक्यों में 'काला' और 'आलसी' ऐसे विशेषण हैं,
जो क्रमशः 'कुत्ता'(संज्ञा) और 'है'(क्रिया) तथा 'लड़का'(संज्ञा) और 'है'(क्रिया) के बीच आये हैं।

यहाँ दो बातों का ध्यान रखना चाहिए- (क) विशेषण के लिंग, वचन आदि विशेष्य के लिंग, वचन आदि के अनुसार होते हैं। जैसे- अच्छे लड़के पढ़ते हैं। आशा भली लड़की है। राजू गंदा लड़का है।

(ख) यदि एक ही विशेषण के अनेक विशेष्य हों तो विशेषण के लिंग और वचन समीपवाले विशेष्य के लिंग, वचन के अनुसार होंगे; जैसे- नये पुरुष और नारियाँ, नयी धोती और कुरता।

विशेषण शब्दों की रचना

हिंदी भाषा में विशेषण शब्दों की रचना संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, अव्यय आदि शब्दों के साथ उपसर्ग, प्रत्यय आदि लगाकर की जाती है।

संज्ञा से विशेषण शब्दों की रचना

संज्ञा विशेषण संज्ञा विशेषण
कथन कथित राधा राधेय
तुंद तुंदिल गंगा गांगेय
धन धनवान दीक्षा दीक्षित
नियम नियमित निषेध निषिद्ध
प्रसंग प्रासंगिक पर्वत पर्वतीय
प्रदेश प्रादेशिक प्रकृति प्राकृतिक
बुद्ध बौद्ध भूमि भौमिक
मृत्यु मर्त्य मुख मौखिक
रसायन रासायनिक राजनीति राजनीतिक
लघु लाघव लोभ लुब्ध/लोभी
वन वन्य श्रद्धा श्रद्धेय/श्रद्धालु
संसार सांसारिक सभा सभ्य
उपयोग उपयोगी/उपयुक्त अग्नि आग्नेय
आदर आदरणीय अणु आणविक
अर्थ आर्थिक आशा आशित/आशान्वित/आशावानी
ईश्वर ईश्वरीय इच्छा ऐच्छिक
इच्छा ऐच्छिक उदय उदित
उन्नति उन्नत कर्म कर्मठ/कर्मी/कर्मण्य
क्रोध क्रोधालु, क्रोधी गृहस्थ गार्हस्थ्य
गुण गुणवान/गुणी घर घरेलू
चिंता चिंत्य/चिंतनीय/चिंतित जल जलीय
जागरण जागरित/जाग्रत तिरस्कार तिरस्कृत
दया दयालु दर्शन दार्शनिक
धर्म धार्मिक कुंती कौंतेय
समर सामरिक पुरस्कार पुरस्कृत
नगर नागरिक चयन चयनित
निंदा निंद्य/निंदनीय निश्र्चय निश्चित
परलोक पारलौकिक पुरुष पौरुषेय
पृथ्वी पार्थिव प्रमाण प्रामाणिक
बुद्धि बौद्धिक भूगोल भौगोलिक
मास मासिक माता मातृक
राष्ट्र राष्ट्रीय लोहा लौह
लाभ लब्ध/लभ्य वायु वायव्य/वायवीय
विवाह वैवाहिक शरीर शारीरिक
सूर्य सौर/सौर्य हृदय हार्दिक
क्षेत्र क्षेत्रीय आदि आदिम
आकर्षण आकृष्ट आयु आयुष्मान
अंत अंतिम इतिहास ऐतिहासिक
उत्कर्ष उत्कृष्ट उपकार उपकृत/उपकारक
उपेक्षा उपेक्षित/उपेक्षणीय काँटा कँटीला
ग्राम ग्राम्य/ग्रामीण ग्रहण गृहीत/ग्राह्य
गर्व गर्वीला घाव घायल
जटा जटिल जहर जहरीला
तत्त्व तात्त्विक देव दैविक/दैवी
दिन दैनिक दर्द दर्दनाक
विनता वैनतेय रक्त रक्तिम

सर्वनाम से विशेषण शब्दों की रचना

सर्वनाम विशेषण सर्वनाम विशेषण
कोई कोई-सा जो जैसा
कौन कैसा वह वैसा
मैं मेरा/मुझ-सा हम हमारा
तुम तुम्हारा यह ऐसा

क्रिया से विशेषण शब्दों की रचना

क्रिया विशेषण क्रिया विशेषण
भूलना भुलक्क़ड़ खेलना खिलाड़ी
पीना पियक्कड़ लड़ना लड़ाकू
अड़ना अड़ियल सड़ना सड़ियल
घटना घटित लूटना लुटेरा
पठ पठित रक्षा रक्षक
बेचना बिकाऊ कमाना कमाऊ
उड़ना उड़ाकू खाना खाऊ
पत् पतित मिलन मिलनसार

अव्यय से विशेषण शब्दों की रचना

अव्यय विशेषण अव्यय विशेषण
ऊपर ऊपरी पीछे पिछला
नीचे निचला आगे अगला
भीतर भीतरी बाहर बाहरी

विशेषण की अवस्थायें या तुलना (Degree of Comparison)

विशेषण(Adjective) की तीन अवस्थायें होती है -
(i)मूलावस्था (Positive Degree)
(ii)उत्तरावस्था (Comparative Degree)
(iii)उत्तमावस्था (Superlative Degree)

(i)मूलावस्था :-किसी व्यक्ति अथवा वस्तु के गुण-दोष बताने के लिए जब विशेषणों का प्रयोग किया जाता है, तब वह विशेषण की मूलावस्था कहलाती है।

इस अवस्था में किसी विशेषण के गुण या दोष की तुलना दूसरी वस्तु से नही की जाती।
इसमे विशेषण अन्य किसी विशेषण से तुलित न होकर सीधे व्यक्त होता है।

कमल 'सुंदर' फूल होता है।
आसमान में 'लाल' पतंग उड़ रही है।
ऐश्वर्या राय 'खूबसूरत' हैं।
वह अच्छी 'विद्याथी' है। इसमें कोई तुलना नहीं होती, बल्कि सामान्य विशेषता बताई जाती है।

(ii)उत्तरावस्था :- यह विशेषण का वह रूप होता है, जो दो विशेष्यो की विशेषताओं से तुलना करता है।
इसमें दो व्यक्ति, वस्तु अथवा प्राणियों के गुण-दोष बताते हुए उनकी आपस में तुलना की जाती है।

जैसे- तुम मेरे से 'अधिक सुन्दर' हो।
वह तुम से 'सबसे अच्छी' लड़की है।
राम मोहन से अधिक समझदार हैं।

(iii)उत्तमावस्था :- यह विशेषण का वह रूप है जो एक विशेष्य को अन्य सभी की तुलना में बढ़कर बताता है।
इसमें विशेषण द्वारा किसी वस्तु अथवा प्राणी को सबसे अधिक गुणशाली या दोषी बताया जाता है।

जैसे- तुम 'सबसे सुन्दर' हो।
वह 'सबसे अच्छी' लड़की है।
हमारे कॉंलेज में नरेन्द्र 'सबसे अच्छा' खिलाड़ी है।

अन्य उदाहरण

मूलावस्था उत्तरावस्था उत्तमावस्था
लघु लघुतर लघुतम
अधिक अधिकतर अधिकतम
कोमल कोमलतर कोमलतम
सुन्दर सुन्दरतर सुन्दरतम
उच्च उच्चतर उच्त्तम
प्रिय प्रियतर प्रियतम
निम्र निम्रतर निम्रतम
निकृष्ट निकृष्टतर निकृष्टतम
महत् महत्तर महत्तम

विशेषण की रूप रचना

विशेषणों की रूप-रचना निम्नलिखित अवस्थाओं में मुख्यतः संज्ञा, सर्वनाम और क्रिया में प्रत्यय लगाकर होती है-

विशेषण की रचना पाँच प्रकार के शब्दों से होती है-

(1) व्यक्तिवाचक संज्ञा से- गाजीपुर से गाजीपुरी, मुरादाबाद से मुरादाबादी, गाँधीवाद से गाँधीवादी।

(2) जातिवाचक संज्ञा से- घर से घरेलू, पहाड़ से पहाड़ी, कागज से कागजी, ग्राम से ग्रामीण, शिक्षक से शिक्षकीय, परिवार से पारिवारिक।

(3) सर्वनाम से- यह से ऐसा (सार्वनामिक विशेषण), यह से इतने (संख्यावाचक विशेषण), यह से इतना (परिमाणवाचक विशेषण), जो से जैसे (प्रकारवाचक विशेषण), जितने (संख्यावाचक विशेषण), जितना (परिमाणवाचक विशेषण), वह से वैसा (सार्वनामिक विशेषण), उतने (संख्यावाचक विशेषण), उतना (परिमाणवाचक विशेषण)।

(4) भाववाचक संज्ञा से- भावना से भावुक, बनावट से बनावटी, एकता से एक, अनुराग से अनुरागी, गरमी से गरम, कृपा से कृपालु इत्यादि।

(5) क्रिया से- चलना से चालू, हँसना से हँसोड़, लड़ना से लड़ाकू, उड़ना से उड़छू, खेलना से खिलाड़ी, भागना से भगोड़ा, समझना से समझदार, पठ से पठित, कमाना से कमाऊ इत्यादि।

कुछ शब्द स्वंय विशेषण होते है और कुछ प्रत्यय लगाकर बनते है। जैसे -

(1)'ई' प्रत्यय से = जापान-जापानी, गुण-गुणी, स्वदेशी, धनी, पापी।
(2) 'ईय' प्रत्यय से = जाति-जातीय, भारत-भारतीय, स्वर्गीय, राष्ट्रीय ।
(3)'इक' प्रत्यय से = सप्ताह-साप्ताहिक, वर्ष-वार्षिक, नागरिक, सामाजिक।
(4)'इन' प्रत्यय से = कुल-कुलीन, नमक-नमकीन, प्राचीन।
(5)'मान' प्रत्यय से = गति-गतिमान, श्री-श्रीमान।
(6)'आलु'प्रत्यय से = कृपा -कृपालु, दया-दयालु ।
(7)'वान' प्रत्यय से = बल-बलवान, धन-धनवान।
(8)'इत' प्रत्यय से = नियम-नियमित, अपमान-अपमानित, आश्रित, चिन्तित ।
(9)'ईला' प्रत्यय से = चमक-चमकीला, हठ-हठीला, फुर्ती-फुर्तीला।

विशेषण का पद-परिचय

विशेषण के पद-परिचय में संज्ञा और सर्वनाम की तरह लिंग, वचन, कारक और विशेष्य बताना चाहिए।

उदाहरण- यह तुम्हें बापू के अमूल्य गुणों की थोड़ी-बहुत जानकारी अवश्य करायेगा।
इस वाक्य में अमूल्य और थोड़ी-बहुत विशेषण हैं। इसका पद-परिचय इस प्रकार होगा-

अमूल्य- विशेषण, गुणवाचक, पुंलिंग, बहुवचन, अन्यपुरुष, सम्बन्धवाचक, 'गुणों' इसका विशेष्य।
थोड़ी-बहुत- विशेषण, अनिश्र्चित संख्यावाचक, स्त्रीलिंग, कर्मवाचक, 'जानकारी' इसका विशेष्य।