किसी विशेष स्थान पर प्रसिद्ध हो जाने वाले कथन को 'लोकोक्ति' कहते हैं।
लोकोक्ति किसी घटना पर आधारित होती है। इसके प्रयोग में कोई परिवर्तन नहीं होता है। ये भाषा के सौन्दर्य में वृद्धि करती है। लोकोक्ति के पीछे कोई कहानी या घटना होती है। उससे निकली बात बाद में लोगों की जुबान पर जब चल निकलती है, तब 'लोकोक्ति' हो जाती है।
यहाँ कुछ लोकोक्तियाँ व उनके अर्थ तथा प्रयोग दिये जा रहे हैं-
अन्धों में काना राजा= मूर्खो में कुछ पढ़ा-लिखा व्यक्ति।
प्रयोग- मेरे गाँव में कोई पढ़ा-लिखा व्यक्ति तो है नही; इसलिए गाँववाले पण्डित अनोखेराम को ही सब कुछ समझते हैं। ठीक ही कहा गया है,
अन्धों में काना राजा।
अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता= अकेला आदमी लाचार होता है।
प्रयोग- माना कि तुम बलवान ही नहीं, बहादुर भी हो, पर अकेले डकैतों का सामना नहीं कर सकते। तुमने सुना ही होगा कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता।
अधजल गगरी छलकत जाय= डींग हाँकना।
प्रयोग- इसके दो-चार लेख क्या छप गये कि वह अपने को साहित्य-सिरमौर समझने लगा है। ठीक ही कहा गया है, 'अधजल गगरी छलकत जाय।'
आँख का अन्धा नाम नयनसुख= गुण के विरुद्ध नाम होना।
प्रयोग- एक मियाँजी का नाम था शेरमार खाँ। वे अपने दोस्तों से गप मार रहे थे। इतने में घर के भीतर बिल्लियाँ म्याऊँ-म्याऊँ करती हुई लड़ पड़ी।
सुनते ही शेरमार खाँ थर-थर काँपने लगे। यह देख एक दोस्त ठठाकर हँस पड़ा और बोला कि वाह जी शेरमार खाँ, आपके लिए तो यह कहावत बहुत
ठीक है कि आँख का अन्धा नाम नयनमुख।
आँख के अन्धे गाँठ के पूरे= मूर्ख धनवान।
प्रयोग- वकीलों की आमदनी के क्या कहने। उन्हें आँख के अन्धे गाँठ के पूरे रोज ही मिल जाते हैं।
आग लगन्ते झोपड़ा, जो निकले सो लाभ= नुकसान होते-होते जो कुछ बच जाय, वही बहुत है।
प्रयोग- किसी के घर चोरी हुई। चोर नकद और जेवर कुल उठा ले गये। बरतनों पर जब हाथ साफ करने लगे, तब उनकी झनझनाहट सुनकर घर के लोग जाग उठे।
देखा तो कीमती माल सब गायब। घर के मालिकों ने बरतनों पर आँखें डालकर अफसोस करते हुए कहा कि खैर हुई, जो ये बरतन बच गये। आग लगन्ते झोपड़ा,
जो निकले सो लाभ। यदि ये भी चले गये होते, तो कल पत्तों पर ही खाना पड़ता।
आगे नाथ न पीछे पगहा= किसी तरह की जिम्मेवारी का न होना।
प्रयोग- अरे, तुम चक्कर न मारोगे तो और कौन मारेगा? आगे नाथ न पीछे पगहा। बस, मौज किये जाओ।
आम के आम गुठलियों के दाम= अधिक लाभ।
प्रयोग- सब प्रकार की पुस्तकें 'साहित्य भवन' से खरीदें और पास होने पर आधे दामों पर बेचें। 'आम के आम गुठलियों के दाम' इसी को कहते हैं।
ओखली में सिर दिया, तो मूसलों से क्या डर= काम करने पर उतारू होना।
प्रयोग- जब मैनें देशसेवा का व्रत ले लिया, तब जेल जाने से क्यों डरें? जब ओखली में सिर दिया, तब मूसलों से क्या डर।
ऊँची दूकान फीके पकवान= केवल ब्राह्य प्रदर्शन।
प्रयोग- जग्गू तेली शुद्ध सरसों तेल का विज्ञापन करता है, लेकिन उसकी दूकान पर बिकता है रेपसीड-मिला सरसों तेल। ठीक है ऊँची दूकान फीके पकवान।
एक पन्थ दो काज= एक काम से दूसरा काम हो जाना।
प्रयोग- दिल्ली जाने से एक पन्थ दो काज होंगे। कवि-सम्मेलन में कविता-पाठ भी करेंगे और साथ ही वहाँ की ऐतिहासिक इमारतों को भी देखेंगे।
कहाँ राजा भोज कहाँ गाँगू तेली= उच्च और साधारण की तुलना कैसी।
प्रयोग- तुम सेठ करोड़ीमल के बेटे हो। मैं एक मजदूर का बेटा। तुम्हारा हमारा और मेरा मेल कैसा ? कहाँ राजा भोज कहाँ गाँगू तेली।
घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध= निकट का गुणी व्यक्ति कम सम्मान पाता है, पर दूर का ज्यादा।
प्रयोग- जग्गू को लोग जगुआ कहकर पुकारते थे। घर त्यागकर सिद्ध पुरुष की संगति में रहकर उसने सिद्धि प्राप्त कर ली और उसका
नाम हो गया- स्वामी जगदानन्द। गाँव लौटा, तो किसी ने उसके गुणों की ओर ध्यान नहीं दिया। ठीक ही कहा गया है: 'घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध।'
चिराग तले अँधेरा= अपनी बुराई नहीं दीखती।
प्रयोग- मेरे समधी सुरेशप्रसादजी तो तिलक-दहेज न लेने का उपदेश देते फिरते है; पर अपने बेटे के ब्याह में दहेज के लिए ठाने हुए हैं।
उनके लिए यही कहावत लागू है कि 'चिराग तले अँधेरा।'
जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ= परिश्रम का फल अवश्य मिलता है।
प्रयोग- एक लड़का, जो बड़ा आलसी था, बार-बार फेल करता था और दूसरा, जो परिश्रमी था, पहली बार परीक्षा में उतीर्ण हो गया।
जब आलसी ने उससे पूछा कि भाई, तुम कैसे एक ही बार में पास कर गये, तब उसने जवाब दिया कि 'जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ'।
नाच न जाने आँगन टेढ़= काम न जानना और बहाना बनाना।
प्रयोग- सुधा से गाने के लिए कहा, तो उसने कहा- साज ही ठीक नहीं, गाऊँ क्या ?कहा है: 'नाच न जाने आँगन टेढ़।'
न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी= न कारण होगा, न कार्य होगा।
प्रयोग- सेठ माणिकचन्द के घर रोज लड़ाई-झगड़ा हुआ करता था। इस झगड़े की जड़ में था एक नौकर। वही इधर की बात उधर किया करता था।
यह बात सेठ को मालूम हो गयी। उन्होंने उसे निकाल दिया। बहुतों ने उसकी ओर से सिफारिश की तो सेठ ने कहा- 'नहीं, वह झगड़ा लगाता है।
'न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।'
होनहार बिरवान के होत चीकने पात= होनहार के लक्षण पहले से ही दिखायी पड़ने लगते है।
प्रयोग- वह लड़का जैसा सुन्दर है, वैसा ही सुशील, और जैसा बुद्धिमान है, वैसा ही चंचल। अभी बारह वर्ष भी पूरे नहीं हुए,
पर भाषा और गणित में उसकी अच्छी पैठ है। अभी देखने पर स्पष्ट मालूम होता है कि समय पर वह सुप्रसिद्ध विद्वान होगा। कहावत भी है,
'होनहार बिरवान के होत चीकने पात'।
हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और= कहना कुछ और करना कुछ और।
प्रयोग- आजकल के नेताओं का विश्वास नहीं। इनके दाँत तो दिखाने के और होते हैं और खाने के और होते हैं।
भागते चोर की लंगोटी ही सही= सारा जाता देखकर थोड़े में ही सन्तोष करना।
प्रयोग- सेठ करोड़ीमल पर मेरे दस हजार रुपये थे। दिवाला निकलने के कारण वह केवल दो हजार रु० ही दे रहा है। मैंने सोचा, चलो भागते चोर की लंगोटी ही सही।
ईश्वर की माया कहीं धूप कहीं छाया= ईश्वर की बातें विचित्र हैं।
प्रयोग- कई बेचारे फुटपाथ पर ही रातें गुजारते हैं और कई भव्य बंगलों में आनन्द करते हैं। सच है ईश्वर की माया कहीं धूप कहीं छाया।
आ बैल मुझे मार= स्वयं मुसीबत मोल लेना।
प्रयोग- लोग तुम्हारी जान के पीछे पड़े हुए हैं और तुम आधी-आधी रात तक अकेले बाहर घूमते रहते हो। यह तो वही बात हुई- आ बैल मुझे मार।
आँखों के अन्धे नाम नयनसुख= गुण के विरुद्ध नाम होना।
प्रयोग- उसका नाम तो करोड़ीमल है परन्तु वह पैसे-पैसे के लिए मारा-मारा फिरता है। इसे कहते है- आँखों के अन्धे नाम नयनसुख।
अन्धा बाँटे रेवड़ी फिर-फिर अपने को दे= अधिकार का नाजायज लाभ अपनों को देना।
अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है= अपने स्थान पर निर्बल भी स्वयं को सबल समझता है।
मुँह में राम बगल में छुरी= कपटपूर्ण आचरण।
एक हाथ से ताली नहीं बजती= झगड़ा एक ओर से नहीं होता।
दूध का दूध पानी का पानी= सही निर्णय।
दूध का जला छाछ को फूंक मारकर पीता है= धोखा खाकर आदमी सतर्क हो जाता है।
जान बची तो लाखों पाये= जान बचने से बड़ा कोई लाभ नहीं है।
खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है= एक का प्रभाव दूसरे पर अवश्य पड़ता है।
साँप मरे न लाठी टूटे= काम भी बन जाये और हानि भी न हो।
रस्सी जल गई ऐंठ न गई= हानि होने पर भी अकड़ समाप्त न होना।
बिल्ली के भाग्य से छींका टूटना= अचानक मनचाहा कार्य हो जाना।
पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होतीं= सभी व्यक्ति एक-से नहीं होते।
दीवारों के भी कान होते हैं= गुप्त बात छिपी नहीं रहती।
थोथा चना बाजे घना= कम जानकार में घमण्ड अधिक होता है।
चोर की दाढ़ी में तिनका= अपराधी स्वयं ही पकड़ा जाता है।
कंगाली में आटा गीला= परेशानी पर परेशानी आना।
एक और एक ग्यारह= एकता में शक्ति होती है।
अन्धा क्या चाहे दो आँख= अपनी मनपसन्द वस्तु को पा लेना।